May 28, 2020

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अष्टम लेखः सम्यग्दृष्टि –प्रभा समाधि के अभ्यास के समय ध्यान देने योग्य बातें (Đệ nhị Tâm pháp: CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI Bài 8: NHỮNG LƯU Ý CẦN BIẾT KHI ĐẾN VỚI CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI)

वियतनाम के गुरु थिनले गुयेन थान द्वारा ‘द्वितीय मानसिक धर्म श्रृंखला’ का “सम्यक् दृष्टि- प्रभा समाधि” विषयक अष्टम लेख: ‘सम्यग्दृष्टि –प्रभा समाधि के अभ्यास के समय ध्यान देने योग्य बातें

अष्टम लेखः सम्यग्दृष्टि –प्रभा समाधि के अभ्यास के समय ध्यान देने योग्य बातें

भाग 7 में, मैंने सम्यक् दृष्टि के अभ्यास को एक-बिंदु (समाधि) अर्थात् निरोध-समापत्ति में बदलने के लिए आठ धर्मों की शरणगमन पर जोर दिया है। स्व-निर्मित छत के फ्रेम की तरह, आठ धर्मों की शरणगमन (मजबूती के लिए) आठ स्तंभ प्रदान करती है जो साधक को गुरु, यिदम और डाकिनी की शक्ति पर भरोसा करने के लिए सहारा बनते हैं। विशेष रूप से, शरण लेने के 8 वें धर्म में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका पर बल दिया गया है: “गुरु त्रिरत्नों का प्रतिनिधित्व करता है। गुरु भक्ति आत्मज्ञान का आधार है। ”

 

वज्रयान परंपरा में, 14 मूल तांत्रिक प्रतिज्ञाओं में सबसे पहली महत्वपूर्ण प्रतिज्ञा है: “गुरू के प्रति सम्मान दिखाएं और गुरु की आलोचना न करें।” एक तिब्बती तांत्रिक गुरु ने एक बार कहा था: “यदि आपका गुरु दुनिया के सभी लोगों को मारना चाहता है, तो आपको परेशान नहीं होना चाहिए या उसके प्रति कोई नकारात्मक विचार नहीं रखना चाहिए।” इन शब्दों का मतलब यह नहीं है कि गुरु हत्या के उद्देश्य को बढ़ावा देता है, बल्कि 24 सामान्य तांत्रिक प्रतिज्ञाओं में से 1 को उजागर करता है। यह सच है क्योंकि कोई भी गुरु कार्य-कारण सिद्धांत के बारे में %0रें।” एक तिब्बती तांत्रिक गुरु ने एक बार कहा था: “यदि आपका गुरु दुनिया के सभी लोगों को मारना चाहता है, तो आपको परेशान नहीं होना चाहिए या उसके प्रति कोई नकारात्मक विचार नहीं रखना चाहिए।” इन शब9 के दाता, बुद्ध पुत्र के प्रति कोई बुरी बात सोचता है, उसे उतने कल्पों तक नरक में रहना पड़ता है जितने क्षण तक उसके हृदय में कलुषित विचार रहता है।” (इति सत्त्रपतौ जिनस्य पुत्रे कलुषं स्वे हृदये करोति यश्च। कलुषोदयसंख्यया स कल्पान् नरकेष्वावसतीति नाथ आह॥ 1/34)

Đạo sư Tịch Thiên

यहाँ ऋषि का तात्पर्य प्रत्येक सत्त्व से है, चाहें वे मनुष्य हों, मूर्तिपूजक हों, बौद्ध अनुयायी हों या उनके शिष्य हों। एक कहानी यह है कि एक व्यक्ति बोधिसत्व को घृणास्पद ढंग से देखने के कारण राक्षसों के लोक में निक्षिप्त हुआ। उस लोक में, वह फिर से बोधिसत्व से मिला और घृणास्पद ढंग से उन्हें पुनः देखने लगा, फिर वह सीधे नरक में गिर गया। यह घातक मूल्य किसी के लिए भी एक सबक है जो मिथ्या दृष्टि और आध्यात्मिक आसक्ति रखता है। स्पष्ट रूप से, अनजाने में किया गया कार्य लापरवाही (अनजाने के दोष) के अधीन होगा, जबकि जानबूझकर किया गया कार्य अहंकार (“मुझे” और “मेरा” से चिपके रहने) के भारी परिणाम वाला होगा। दूसरी ओर, हम “सम्यग्दृष्टि-प्रभा समाधि” का अभ्यास करते हैं, किन्तु सम्मान की सम्यक् दृष्टि को याद करते हैं, तो ऐसा लगता है कि हम दो नावों पर सवार होना चाहते हैं। यह इस तथ्य से आता है कि एक व्यक्ति जिसे अभ्यास करने की अनुमति है या धर्म का सच्चा संचरण प्राप्त करता है, वह सम्यक् दृष्टि के चार पहलुओं में से एक की कमी के कारण स्थिर रहता है। तदनुसार वह मिथ्या दृष्टि वाला व्यक्ति बन जाता है, जो 18 मूल बोधिचित्त प्रतिज्ञाओं में से आठवीं प्रतिज्ञा को तोड़ता है – “मिथ्या दृष्टि”। एक बार अपने गुरु के प्रति असम्मानजनक रवैया दिखाने पर उन्हें मिथ्या दृष्टि दिखाई देती है (अपने आपको गुरु के शिष्य के रूप में स्वीकार किए जाने के बाद आध्यात्मिक गुरु के प्रति बुरे विचार लाते हैं या आलोचना करते हैं)। मिथ्या दृष्टि वाले लोगों के पांच व्यवहारों के प्रदर्शन के साथ-साथ, तांत्रिक प्रतिज्ञाओं और बोधिचित्त प्रतिज्ञाओं के उल्लंघन पर लगने वाले पाप (जिनमें से चौथा एक है: “अपमानजनक सलाह”) की तुलना झर्झर नींव से युक्त महल सदृश सम्यक् दृष्टि से की जाती है। तो इस गंभीर गलती से कैसे बचें? आप इस प्रकार अनुपालन करें:

1 / गुरु भक्ति दिखाने के लिए कर्म के रूप में लेख पढ़ना और टिप्पणी करना

2 / यह समझ विकसित करना कि गुरु की वज्र आलोचना का उद्देश्य दुष्ट मन, दुष्ट दृष्टि और शिष्य के पतन को धोना है क्योंकि एक सच्चा गुरु, गलत काम करने पर अपने शिष्यों को फटकारता भी है। बीमारी को ठीक करने में मदद करने वाली कड़वी औषधि की तरह ही वज्र-आलोचना को माना जाता है। इसलिए आक्रोश या महत्त्व खत्म होने वाले व्यवहार के रूप में देखने की अपेक्षा, शिष्य को इसे “सम्यक् दृष्टि समाधि की प्रकृष्ट प्रभा” रुपी अपने महल के निर्माण के एक अच्छे अवसर के रूप में लेना चाहिए। यही कारण है कि बौद्ध धर्म के सात खजानों में से, “नैतिक लज्जा” (हिरी) का खजाना “नैतिक भय” (ओत्तप्प) के खजाने से बड़ा  है।

3 / भाग 4: “सम्यक् दृष्टि से लाभ, मिथ्या दृष्टि से हानि”: में बताए गए छह मामलों के संबंध में नियमित आत्म-प्रतिबिंबन करना।

सम्यक् दृष्टि रहित बौद्ध साधकों पर छोड़े गए आपके विशिष्ट परिणाम इस प्रकार होंगे:

(1) लगन से काम करोगे लेकिन परिणाम बहुत कम मिलेगा

(2) न तो धर्मनिरपेक्ष जीवन और न ही साधना सफल होगी

(3) स्वयं (आत्म-आसक्ति) से और धर्म (धर्म-आसक्ति) से चिपके रहोगे

(4) शरीर और मन के भीतर एकत्रित नकारात्मक वेदनाओं और भावनाओं के कारण उदास या हर्षित चेहरा बना रहेगा

(5) अप्रत्याशित जोखिमों का सामना करना होगा

(6) बुद्ध की भूमि में पुनर्जन्म लेने का दुर्लभ अवसर नहीं मिलेगा

4 / उचित समय पर गुरु के सम्मुख पश्चाताप करना, सबसे सरल रूप में गुरु से फोन पर बात करके या उन्हें ईमेल करके अथवा अधिक गंभीर रूप से सीधे उनके पास आकर, जैसा कि अश्वघोष द्वारा “गुरु भक्ति के पचास छंदों (गुरुपञ्चाशिका)” में पढ़ाया गया है। एक कहावत है कि गलती करने से डरने की जरूरत नहीं है, बल्कि डरना पश्चाताप करने में विफलता से है।

जो मैं आपको बता रहा हूं उसका उद्देश्य आपको साधना का एक स्पष्ट नक्शा प्राप्त करने में मदद करना है, न कि आपमें हीनता की भावना को जगाना। एक और सूचना यह है कि जिन लोगों ने अभी तक त्रिरत्नों की शरण ली है, उन्हें बुद्ध द्वारा सिखाई गई अन्य आध्यात्मिक अभ्यासों को प्राप्त करने के लिए आठ धर्मों का पालन करना चाहिए। मुझे गर्व है कि सॉन्ग गुयेन तंत्र हाउस के अधिकांश अनुयायी और शिष्य chanhtuduy.com पर पढ़ने के माध्यम से अपनी गहन समझ के साथ गुरु भक्ति का अच्छा अभ्यास करते हैं। कुछ लोग, जिनका मैं नामशः उल्लेख नहीं कर रहा, गलती करते हैं। यह बेहतर होगा कि वे इसे न दोहराएं और गुणों के विस्मरण को रोकने के लिए जल्दी से पश्चाताप करें।

स्वयं तथा दूसरों के लिए लज्जा और भय का भाव रखते हुए सभी सत्त्व सजग (सम्मासति से युक्त) होंवे।

ओं मणि पद्मे हूं

लेखक – थिनले गुयेन थान (फु वान पर्वत की चोटी पर एक बरसात की दोपहर में, 17 जनवरी 2019)

अनुवादक- डॉ. विकास सिंह (भारत के बिहार के दरभंगा में स्थित ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में संस्कृत के सहायक आचार्य हैं।)


अंग्रेजी अनुवाद:  NHỮNG LƯU Ý CẦN BIẾT KHI ĐẾN VỚI CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI

वियतनामी मूल: Thanh Tri – the 2nd Mind Dharma: SAMYAGDRSTI – PRABHA SAMADHI – Part 8: THINGS TO NOTICE AS YOU PRACTICE SAMYAGDRSTI – PRABHA SAMADH (Đệ nhị Tâm pháp Thanh Trí: CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI Bài 8: NHỮNG LƯU Ý CẦN BIẾT KHI ĐẾN VỚI CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI)I (


THANH TRI – THE 2ND MIND DHARMA: SAMYAGDRSTI – PRABHA SAMADHI

PART 1: INTRODUCTION

PART 2: WHAT IS RIGHT VIEW?

PART 3: RIGHT VIEW IN DIFFERENT ASPECTS”

PART 4: GAIN FROM RIGHT VIEW, LOSE OF WRONG VIEW

PART 5: HOW TO BE EQUIPPED WITH THE FULL RIGHT VIEW

PART 7:  HOW TO TURN THE BRILLIANT LIGHT (PRABHA) INTO SAMADHI? 

PART 8:  THINGS TO NOTICE AS YOU PRACTICE SAMYAGDRSTI – PRABHA SAMADH

PART 9:  HOW DOES THE 2NDMIND DHARMA WORK?

PART 10:  WORDS FROM A MAN WHO WISHES TO BE THE 3RD HARDLY MET PERSON


Đệ nhị Tâm pháp Thanh Trí CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI:

Bài 1: LỜI NÓI ĐẦU

Bài 2: THẾ NÀO GỌI LÀ CHÁNH KIẾN?

Bài 3: NHỮNG GÓC TƯ DUY VỀ CHÁNH KIẾN 

Bài 4: ÍCH LỢI TỪ CHÁNH KIẾN, TÁC HẠI TỪ TÀ KIẾN

Bài 5: LÀM SAO ĐỂ ĐƯỢC TRANG BỊ CHÁNH KIẾN TOÀN DIỆN?

Bài 6: LÀM SAO ĐỂ CHÁNH KIẾN ĐƯỢC QUANG MINH?

Bài 7: LÀM SAO ĐỂ QUANG MINH THÀNH TAM MUỘI?

Bài 8: NHỮNG LƯU Ý CẦN BIẾT KHI ĐẾN VỚI CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI

Bài 9: CƠ CẤU VẬN HÀNH CỦA TÂM PHÁP “CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI”

Bài 10: TÂM SỰ CỦA KẺ LUÔN MONG ĐƯỢC NOI GƯƠNG HẠNG NGƯỜI THỨ BA


 

  1. Dr C H Lakshminarayan says:

    Adaraniya  aapke charanome namaskar kartha hu.

    ” Guruvina gulaam banne thak mukthi (moksh)  nahi milthi “.!

    In Hindu dharmame, ek bada mahathma Guru ,jamadagni  and uska pathni Renuka and beta ‘ Parashuram’ ashram me jindagi gujarthe  te. Beta Parashuram  Guru jamadagni ka shishya bhi ta.,!.  Ek din guru jamadagni   wife Renukadevi ko puja keliye  gata l paani ko thode dur raha nadi se laane ko adesh diya. Renuk paane chali.

    Nadi me pas  ek  sundar yuvaraj naha rahata. Vah  Yuvaraj thodi der keliye Renuka se kushal bathcheeth  karthe thoda set hogaya.! Isise guru jamadagni ko  bahut ghussa agaya. Unhone  beta and shishya Paruharam ko  uska  khadga ( Axe) se uski ma , Renuka  ka  cir (neck)  kaat ( cut) karne  adesh diya.! .Beta and shishya Parushram ne, bina dusre sochtehuye Renuka ka cir (neck)  kat (cut) diya.!

    Guru se shishya ka  gurubhakti( devotion)

    tho  aisa hona. !

    Om Mani Padme Hum.

    Tantra Nirvadeva

     

     

     

  2. Tantra Dharmapabodhisita  says:

    Dear H.H. Guru,

     

    Thanks (Puṇyānumodana), for teaching us the things how to notice when we are practising Samyagdṛṣṭi-Prabhā Samādhi.

    While the learning process, one should never criticize the Guru, one should always show respect to the Guru. You still thinking us, in your every article there is a theoretical aspect, but the practical element is also available for practising right view. In this article, you told us how to avoid severe mistakes while occurring during the wrong view. Your teachings are the path of cultivation and a cultivated mind always be a happy mind.

    Yidam and Dakini these are two new words for me, please elaborate these words in your blessing language for clearing my concept regarding these words.

     

     

    Om Mani Padme Hum

     

    Regards and Thanks

     

    Tantra Dharmapabodhisita 

    • Nguyên Thành
      Nguyên Thành says:

      I agree with your point. Thank for your comment. Yidam is Avalokiteshvara in this article, Dakini is deva in sky. She always is practitioner and often help us to lead to Enlightenent!

  3. Tantra Dharmapabodhisita  says:

    Thanks Guru

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