Apr 27, 2020

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चतुर्थ भाग: सम्यक् दृष्टि से लाभ और मिथ्या दृष्टि से हानि (Đệ nhị Tâm pháp Thanh Trí: CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI Bài 4: LỢI ÍCH TỪ CHÁNH KIẾN, TÁC HẠI TỪ TÀ KIẾN)

चतुर्थ भाग:  सम्यक् दृष्टि से लाभ और मिथ्या दृष्टि से हानि (Đệ nhị Tâm pháp Thanh Trí: CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI Bài 4: LỢI ÍCH TỪ CHÁNH KIẾN, TÁC HẠI TỪ TÀ KIẾN)

वियतनाम के गुरु थिनले गुयेन थान द्वारा ‘द्वितीय मानसिक धर्म श्रृंखला’ का “सम्यक् दृष्टि- प्रभा समाधि” विषयक चतुथ लेख: ‘सम्यक् दृष्टि से लाभ, मिथ्या दृष्टि से हानि’

चतुर्थ भागसम्यक् दृष्टि से लाभ और मिथ्या दृष्टि से हानि

बुद्ध ने कात्यायनगोत्त सूत्र (पालि में कच्चानगोत्तसुत्त) में सम्यक् दृष्टि से प्राप्त होने वाले अद्भुत लाभों पर बल देते हुए कहा है: “जो तृष्णा से घिरा हुआ नहीं है, जो ‘ममत्व अथवा मोह’ के बंधन रूपी तृष्णा और उपादान से प्रभावित नहीं होता है अर्थात् आत्मभाव में नहीं पड़ता है। उसे किसी भी तरह की अनिश्चितता या संदेह नहीं रहता है कि दुःख अथवा तनाव, जब उत्पन्न हो रहा है, तो उत्पन्न हो रहा है; जब रुक रहा है, तो रुक रहा है। उसका ज्ञान दूसरों से स्वतंत्र है। उस ज्ञान को ही सम्यक् दृष्टि कहा जाता है।”

बुद्ध की (यह) परिभाषा हमें सम्यक् दृष्टि का सबसे व्यावहारिक पहलू दिखाती है जो कि साधक के “ममत्व” के बंधन, “मेरे लिए/केवल मेरे लिए” के स्वार्थ और “मेरे कारण से ही” के अहंकार को तोड़ने में मदद करती है। जब कोई दुःखी होता है, तो साधक जानता है कि वह “शुद्ध हो रहा है (उसका शोधन हो रहा है)” अथवा भारी कर्म हल्के कर्मों में या हल्के कर्म कुछ नहीं में परिवर्तित हो रहे हैं। (पद्मसंभव के शिक्षण “दस स्पष्ट सत्य”)। जब तक वह अधिक संदेह, संदेह और चिंता, संदेह और परम सत्य के प्रति पछतावे को महसूस नहीं करेगा – जो कि बुद्ध द्वारा कहे गए “चार आर्य सत्य” हैं, ताकि वह सिद्धांत का अध्ययन करते हुए, धर्म-निष्ठा से साधना करते हुए धर्म की साधना करते रहें (श्रवण-मनन-साधना)। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह सम्यक् दृष्टि स्वतंत्र रूप से प्राप्त की जा सकती है, दूसरों से उधार नहीं ली जा सकती और न ही प्रभावित हुआ जा सकता है।’ इसका मतलब यह है कि बौद्धेतर संप्रदाय जैसे उपादान अथवा हठधर्मिता में पतित होते हैं, यह (सम्यक् दृष्टि) इससे मुक्त है।

संयुत्त निकाय पर वापिस लौटते हैं, कच्चानगोत्त सम्यक् दृष्टि पर बुद्ध की देशना सुनकर अर्हतत्व की प्राप्ति कर लेता है। राजा पसेनदि (प्रसेनजित) सहित राजा अजातशत्रु सम्यक् दृष्टि के जागृत होने के बाद दोनों चौंक गए, तब बौद्ध धर्म को पूर्णतः संरक्षण दिया। एक विशेष उदाहरण प्रस्तुत किया उपासक अनाथपिंडक ने, जिसने कोसल के राजा पसेनदि के बेटे राजकुमार जेत की चुनौती पर, स्वेच्छा से एक बड़े उद्यान को सोने के टुकड़ों से ढँक दिया, फिर इसे बुद्ध और संघ को दान के रूप में देने के लिए जेतवन विहार के निर्माण के लिए राजकुमार जेत से खरीदा।

बुद्ध के समय में, 95 से अधिक तैर्थिक (=विधर्मी संप्रदाय) साधकों ने अपने जीवन का अधिकांश समय आसन पर ध्यान करते हुए बिताया लेकिन जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त नहीं हो सके। बुद्ध के द्वारा निब्बाण प्राप्ति तक, सबसे पहले सम्यक् दृष्टि उत्पन्न हुई जिसने प्रबुद्ध ज्ञान और प्रज्ञा को खोलने के लिए आधार तैयार किया। सम्यक् दृष्टि के लाभ वास्तव में अवर्णनीय हैं, क्योंकि बौद्ध साधक किसी भी प्रयास और शक्ति के बिना आसानी से सम्यक् दृष्टि प्राप्त कर सकते हैं। नागार्जुन बोधिसत्व ने भी माध्यमिक (मध्यम मार्ग) को सम्यक् दृष्टि के आधार पर विकसित किया था। आश्चर्य की बात है कि यह सम्यक् दृष्टि ही थी कि ओद्दियाना (भारत) की भूमि से, कमल से उत्पन्न संत पद्मसंभव ने “सिंहनाद” के साथ तिब्बत में एक बहस में सभी विरोधियों को जीत लिया था।

सांग गुयेन तंत्र हाउस ने नज़रिए की सम्यक् दृष्टि, पूजा और सम्मान से बौद्ध धर्म के अंदर और बाहर व्याप्त बुरी ताकतों को हराया है। मुक्ति की सम्यक् दृष्टि से, सांग गुयेन तंत्र हाउस के सभी अनुयायी और शिष्य एक ही समय में गुण और ज्ञान को विकसित कर सकते हैं, जिससे परिणाम तीव्र गति से प्राप्त होते हैं। धर्म-निरपेक्ष जीवन की सफलता और साधना पथ की उपलब्धियों का चित्रण, माट तू, माट होंग तुयेन, माट थू, माट खाइ गुयेन जैसे सदस्यों की कई कहानियों के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है, जो आश्चर्यजनक ढंग से विदेश में अध्ययन के अपने लक्ष्य को आगे बढ़ाने में बाधाओं पर विजय प्राप्त किए हैं। तो उनकी सफलता कहां से आती है? सम्यक् दृष्टि के कारण, सम्यक् दृष्टि पर स्थापित होने के कारण, सम्यक् दृष्टि पर चिंतन के कारण और सम्यक् दृष्टि के व्यावहरिक उपयोग के कारण, जो “सत्त्वों के लाभ” के लिए सही विचार के चार पहलुओं के साथ-साथ अनुप्रयोग के चार पहलुओं पर आधारित है। सभी बौद्ध साधक सम्यक् दृष्टि से सुसज्जित नहीं हैं। यदि सभी को इसका पूरा ज्ञान नहीं है, तो इसके परिणामस्वरूप पूजा, सम्मान और दृष्टिकोण जैसे चार पहलुओं में से एक, दो या तीन की गलती हो जाती है। उनकी गलतियों को बहस या तर्क के माध्यम से उजागर किया जाता है जो बौद्ध धर्म में तार्किक सोच (हेतुविद्या) के खिलाफ जाते हैं। यदि सम्यक् दृष्टि का पूरा ज्ञान प्राप्त करना है, तो सभी लोग – सही समय, सही व्यक्ति, सही संदर्भ, सही स्थिति या सही वातावरण में लागू करने में सक्षम नहीं हैं। जब उनके पास धर्म-अभ्यासों के आवश्यक चयन की कमी होती है, अर्थात एक ही अभ्यास में विभिन्न गतिविधियों को मिला देते हैं जैसे कि कई मंत्रों का जाप करना, बुद्ध के नाम का पाठ करना, मंत्र का पाठ करना और एक ही समय में ध्यान करना। यही कारण है कि मठीय जीवन जीने के बाद भी “गृहस्थ जीवन में लौटने पर” या तो बच्चों को गोद लेकर या व्यक्तिगत उद्देश्यों के लिए दान करके, या प्रसिद्धि के लिए रिकॉर्ड बनाने लग जाते हैं। यह तब है जब वे ध्यान, अभ्यास और विशुद्ध भूमि संप्रदाय से चिपके रहते हैं; ज़ेन या तंत्रयान की परंपरा को बाधित करते हुए शुद्ध भूमि बौद्ध अभ्यासों का प्रदर्शन करें; थेरवाद की मांसाहारी परंपरा की आलोचना करते हुए महायान का पालन करें या इसके विपरीत, महायान और तंत्रयान के शास्त्रों की प्रामाणिकता को नकारते हुए थेरवाद का अनुसरण करें। इस तरह की आदतें और गतिविधियाँ द्वंद्वात्मकता के लिहाज से नहीं हैं, अगर विफलताओं को ना देखें तो उपलब्धियों को हासिल करना कठिन है, जैसा कि बोधिसत्व नागार्जुन ने कहा है, “बिना सम्यक् दृष्टि के सभी श्रेष्ठ कर्म गंभीर परिणाम उत्पन्न करेंगे।” बुद्ध ने अवतंसक सूत्र (द फ्लावर एडोर्नमेंट सूत्र) में भी चेतावनी दी थी, “बोधिचित्त पर स्थापित नहीं होने वाली सभी अच्छी प्रथाओं को गलत व्यवहार माना जाता है।” यही कारण है कि जिन लोगों के बिना या सम्यक् दृष्टि की कमी के कारण अक्सर पांच मामलों में से एक में कमी आती है:

(1) मुस्कुराने लायक चीजों पर न मुस्कुराना

(2) खुश होने लायक जो चीजें हैं उसके लिए खुश न होना

(3) जो दयावान होने के लायक है उसके लिए दया न करना

(4) अच्छे परामर्श को न सुनना

(5) बुरे कर्म करने पर शर्म महसूस न करना

सम्यक् दृष्टि रहित बौद्ध साधकों पर छोड़े गए आपके विशिष्ट परिणाम इस प्रकार होंगे:

(1) लगन से काम करोगे लेकिन परिणाम बहुत कम मिलेगा

(2) न तो धर्मनिरपेक्ष जीवन और न ही साधना सफल होगी

(3) स्वयं (आत्म-आसक्ति) से और धर्म (धर्म-आसक्ति) से चिपके रहोगे

(4) शरीर और मन के भीतर एकत्रित नकारात्मक वेदनाओं और भावनाओं के कारण उदास या हर्षित चेहरा बना रहेगा

(5) अप्रत्याशित जोखिमों का सामना करना होगा

(6) बुद्ध की भूमि में पुनर्जन्म लेने का दुर्लभ अवसर नहीं मिलेगा

इसके विपरीत, पूरी सम्यक् दृष्टि वाले बौद्ध साधकों को निम्नलिखित फायदे होंगे:

(1) कम परिश्रम लेकिन ज्यादा परिणाम

(2) या तो धर्मनिरपेक्ष जीवन या आध्यात्मिक अभ्यास सफल

(3) आत्म-आसक्ति और धर्म-आसक्ति धीरे-धीरे कम हो जाएगी और अंत में गायब हो जाएंगी

(4) प्रकाश या प्रदीप्ति (प्रभास्वर) की तीन तरंगों के मेल से उज्ज्वल चेहरे की उत्पत्ति

(5) अप्रत्याशित क्रमिक घटनाएं होंगी

(6) बुद्ध की भूमि में पुनर्जन्म होगा

मैं इस भाग को कालाम सूत्र (पालि में कालामसुत्त) के एक उद्धरण द्वारा समाप्त करूँगा ताकि आप यह समझ सकें कि आप तभी उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकते हैं जब आपके प्रयास से आपको सम्यक् दृष्टि प्राप्त हो, दूसरों के प्रभाव से नहीं। साधना का लंबा या छोटा रास्ता तब आपके आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन पर निर्भर करता है।

– कालामों, संदेह करना और अनिश्चित होना आपके लिए उचित है। इस मामले में, यदि आपको इसके बारे में अच्छी तरह से पता नहीं है, तो आपको न तो अन्य धर्मों के सिद्धांत पर ध्यान देना चाहिए और न ही तिरस्कार करना चाहिए। कालामों आओ, तथागत ने तुम्हारे लिए सम्यक् श्रद्धा के दस आधारों की देशना की है।

Mantra OM MANI PADME HUM in the Lotus. Buddhism. Vector illustration.

– जो बार-बार बोला जा रहा है, उसे सत्य मत मानों

– पीढ़ी दर पीढ़ी परंपराओं के निर्वहन से कोई बात सत्य नहीं हो जाती

– अफवाहों पर न जाएं या क्योंकि लोग इसके बारे में बहुत बात करते हैं, ये भी सत्य नहीं है

– जो धर्मग्रंथों में है, वो सब सत्य नहीं है

– किसी भी चीज को केवल इसलिए सत्य मत मानों कि वह तर्क द्वारा स्थापित है

– किसी भी स्वयंसिद्ध की बात को सत्य न माने क्योंकि यह आपके दृष्टिकोण के अनुरूप है

– ऊपर से तर्कसंगत लगने वाली खोखली बात को सत्य मत मानों

– एक पूर्वाग्रह के पक्ष में दूसरे पूर्वाग्रह को इसलिए सत्य मत मानों क्योंकि यह आपकी धारणा पर आधारित है

– किसी चीज को केवल इसलिए मत मानों क्योंकि वह भीड़ और शक्ति की भव्यरूपता द्वारा समर्थित है

– गुरूओं या प्राचीन ऋषियों द्वारा सिखाने से कोई बात सत्य नहीं हो जाती

-लेकिन कालामों, जब तुम स्वयं जान लो और जाँच कर लो, कारण और अनुभव से सहमत हो जाओ, “ये बातें अच्छी हैं; ये बातें दोषपूर्ण नहीं हैं; बुद्धिमानों द्वारा इन चीजों की प्रशंसा की जाती है; तभी उनको आरम्भ करना और देखना, ये चीजें बड़े पैमाने पर दुनिया में सभी के लिए खुशी और लाभ का कारण बनती है0वन या आध्यात्मिक अभ्यास सफल

(3) आत्म-आसक्ति और धर्म-आसक्ति धीरे-धीरे कम हो जाएगी और अंत में गायब हो जाएंगी

(4) प्रकाश या प्रदीप्ति (प्रभास्वर) की तीन तरंगों के मेल से उज्ज्वल चेहरे की उत्पत्4 मत मानों

– पीढ़ी दर पीढ़ी परंपराओं के निर्वहन से कोई बात सत्य नहीं हो जाती

– अफवाहों पर न जाएं या क्योंकि लोग इसके बारे में बहुत बात करते हैं, ये भी सत्य नहीं है

– जो धर्मग्रंथों में है, वो सब सत् दृष्टि के साथ-साथ अपने आप को पूरी तरह से कैसे सुसज्जित किया जाए, उसे मैं भाग 5 में बताऊंगा।

सभी सत्त्व बुद्ध के स्वभाव से सुख प्राप्त करें।

ओं मणि पद्मे हूं

लेखक – थिनले गुयेन थान (फु वान पर्वत की चोटी पर एक बरसात की दोपहर में, 12 जनवरी 2019)

अनुवादक- डॉ. विकास सिंह (भारत के बिहार के दरभंगा में स्थित ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में संस्कृत के सहायक आचार्य हैं।)


अंग्रेजी अनुवाद: Thanh Tri – the 2ndMind Dharma: SAMYAGDRSTI – PRABHA SAMADHI – Part 4: GAIN FROM RIGHT VIEW, LOSE OF WRONG VIEW (Đệ nhị tâm pháp Thanh Trí: Chánh kiến quang minh tam muội – Bài 4: Ích lợi từ chánh kiến, tác hại từ tà kiến)

वियतनामी मूल: Đệ nhị Tâm pháp Thanh Trí: CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI Bài 4: ÍCH LỢI TỪ CHÁNH KIẾN, TÁC HẠI TỪ TÀ KIẾN(Bài mở đặc biệt)

 


 

संबंधित लेख:

प्रथम भाग:  परिचय (Đệ nhị Tâm pháp Thanh Trí: CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI Bài 1:  LỜI NÓI ĐẦU)

सम्यक् दृष्टि क्या है? ( Đệ nhị tâm pháp Thanh Trí: CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI Bài 2: THẾ NÀO GỌI LÀ CHÁNH KIẾN?)

तृतीय भाग: विभिन्न पक्षों में सम्यक् दृष्टि (Đệ nhị Tâm pháp Thanh Trí: CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI Bài 3: NHỮNG GÓC TƯ DUY VỀ CHÁNH KIẾN)

चतुर्थ भाग: सम्यक् दृष्टि से लाभ और मिथ्या दृष्टि से हानि (Đệ nhị Tâm pháp Thanh Trí: CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI Bài 4: LỢI ÍCH TỪ CHÁNH KIẾN, TÁC HẠI TỪ TÀ KIẾN)


THANH TRI – THE 2ND MIND DHARMA: SAMYAGDRSTI – PRABHA SAMADHI

PART 1: INTRODUCTION

PART 2: WHAT IS RIGHT VIEW?

PART 3: RIGHT VIEW IN DIFFERENT ASPECTS”

PART 4: GAIN FROM RIGHT VIEW, LOSE OF WRONG VIEW

PART 5: HOW TO BE EQUIPPED WITH THE FULL RIGHT VIEW

PART 7:  HOW TO TURN THE BRILLIANT LIGHT (PRABHA) INTO SAMADHI? 

PART 8:  THINGS TO NOTICE AS YOU PRACTICE SAMYAGDRSTI – PRABHA SAMADH

PART 9:  HOW DOES THE 2NDMIND DHARMA WORK?

PART 10:  WORDS FROM A MAN WHO WISHES TO BE THE 3RD HARDLY MET PERSON


Đệ nhị Tâm pháp Thanh Trí CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI:

Bài 1: LỜI NÓI ĐẦU

Bài 2: THẾ NÀO GỌI LÀ CHÁNH KIẾN?

Bài 3: NHỮNG GÓC TƯ DUY VỀ CHÁNH KIẾN 

Bài 4: ÍCH LỢI TỪ CHÁNH KIẾN, TÁC HẠI TỪ TÀ KIẾN

Bài 5: LÀM SAO ĐỂ ĐƯỢC TRANG BỊ CHÁNH KIẾN TOÀN DIỆN?

Bài 6: LÀM SAO ĐỂ CHÁNH KIẾN ĐƯỢC QUANG MINH?

Bài 7: LÀM SAO ĐỂ QUANG MINH THÀNH TAM MUỘI?

Bài 8: NHỮNG LƯU Ý CẦN BIẾT KHI ĐẾN VỚI CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI

Bài 9: CƠ CẤU VẬN HÀNH CỦA TÂM PHÁP “CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI”

Bài 10: TÂM SỰ CỦA KẺ LUÔN MONG ĐƯỢC NOI GƯƠNG HẠNG NGƯỜI THỨ BA


  1. Tantra Dharmapabodhisita says:
    Dear H.H. Guru,

    Through this article, I can understand how to gain from right view and how to lose of wrong view. You have very well equipped this article through Kālāmasutta and Kaccānagottasutta. I have translated this Kālāmasutta in poetic sense in Hindi language. This is the line to line poetic translation of Kālāmasutta, I am writing for your blessing here.

    कोसल में विचरण करते गौतम ने उपदेश दिया

    सत्य, अहिंसा, शील की बातों का प्रचार किया

    सुनों कालामों! नफ़रत फैलाने वालों का बहिष्कार करो

    आओ कालामों जान सत्य को नव भारत का निर्माण करो

    बारम्बार जो बोला जाए, सत्य न उसको जानो (मा अनुस्सव)

    रही परम्परा निर्वहन की, क्यों उसको तुम मानो (मा परम्पराय)

    अफवाहों से दूर रहकर प्रकाश को पहचानो (मा इतिकिराय)

    धर्मग्रन्थ के पन्नों पर लिखा हर वाक्य सत्य नहीं (मा पिटक सम्पादानेन)

    तर्कों से जो हो स्थापित वो भी तो मान्य नहीं (मा तक्कहेतु )

    कोई बने स्वयंसिद्ध वो भी सत्य के पास नहीं (मा नयहेतु)

    बाहर से तार्किक हो पर अन्दर खोखला ज्ञान वही ( मा आकार-परिवितक्केन)

    पूर्वाग्रह से ग्रसित दूसरा पूर्वाग्रह स्वीकार नहीं (मा दिट्ठिनिज्झानक्खन्तिया)

    भव्यरूपता देख किसी की सत्य का वो पैमाना न (मा भब्बरूपताय)

    कोई श्रमण गुरू कहे स्वीकरण का ये निशाना न (मा समणो नो गरू)

    सुनों कालामो! सच्चाई को सबसे पहले जानो तुम (कालामा, अत्तनाव जानेय्याथ)

    अच्छे और बुरे को पहचानो तुम (इमे धम्मा कुसला, इमे धम्मा अनवज्‍जा)

    बुद्धिमान यदि करे प्रशंसा तब ही उसको मानो तुम (इमे धम्मा विञ्‍ञुप्पसत्था)

    हितकारी हो, सुखकारी हो उसको ही स्वीकार करो (इमे धम्मा समत्ता समादिन्‍ना हिताय सुखाय संवत्तन्तीति)

    तभी कालामों! किसी बात को मानो और अभ्यास करो। (अथ तुम्हे, कालामा, उपसम्पज्‍ज विहरेय्याथा’ति)

  2. Tantra Dharmapabodhisita says:
    Dear H. H. Guru

    I want to know that as a human being, I always find a lot of mental fabrications. How can I control them? Sometime I am living happily, somebody or any relative or any friend come and give me the mental problems. How can I lose that situation and that moment how can I gain right view?

    Tantra Dharmapabodhisita

    • Nguyên Thành
      Nguyên Thành says:

      Dear Tantra Dharmapabodhisital!
      Your question will take a lot of time but I am trying for you.Buddha taught that needn’t to control mind (thinking, metal fabrications..). It is simple that only look at it (come or go out). Let’s remember “Worrying about what is not worth worrying will grow in afflictions. Not worrying about what is not to worry will increase afflictions”. In my opinion, right view help you well! If you can’t make it, please think that not consider things as failures!

  3. Tantra Dharmapabodhisita says:

    Thanks GURU for your spiritual guidence. I will try to my best according your words.

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