May 17, 2020

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पंचम भाग: पूर्ण सम्यक् दृष्टि से सुसज्जित कैसे होंवे (Đệ nhị Tâm pháp Thanh trí: CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI Bài 5: LÀM SAO ĐỂ ĐƯỢC TRANG BỊ CHÁNH KIẾN TOÀN DIỆN?)

वियतनाम के गुरु थिनले गुयेन थान द्वारा ‘द्वितीय मानसिक धर्म श्रृंखला’ का “सम्यक् दृष्टि- प्रभा समाधि” विषयक पंचम लेख: ‘पूर्ण सम्यक् दृष्टि से सुसज्जित कैसे होंवे’)

पंचम भाग पूर्ण सम्यक् दृष्टि से सुसज्जित कैसे होंवे

बुद्ध से पहले और उनके समय के दौरान, यद्यपि 96 पैगनों (प्रकृति पूजकों/तैर्थिकों) ने जंगलों या पहाड़ों में अपने तरीकों से अभ्यास करने की कोशिश की, लेकिन उनके पास सम्यक् दृष्टि नहीं थी। जब बोधि वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ, तो सभी प्राणी उनके ज्ञान के प्रकाश में डूबने के लिए बहुत खुश थे, उस ज्ञान को सम्यक् दृष्टि कहा गया। भगवान् बुद्ध ने निश्चित परिस्थितियों में जो सिखाया, अथवा भिक्खुओं या उपासकों द्वारा पूछे गए विशिष्ट प्रश्नों का जो विस्तार से उत्तर दिया वही सम्यक् दृष्टि है। बुद्ध की शिक्षाओं को उनकी प्रत्यक्ष वाणी के माध्यम से याद किया गया, फिर अक्षरों में लिखा गया जिसे सूत्र कहा गया (सूत्र का अर्थ उनकी अभिव्यक्ति की संगति है)। भगवान् बुद्ध और अन्य बौद्ध तर्कशास्त्रियों की पुष्टि के अनुसार, उन्हीं शिक्षाओं को सूत्र कहा जा सकता है, जो बुद्ध, अर्हत् और बोधिसत्व जैसे प्रबुद्ध लोगों (जो शून्य-प्रज्ञा प्राप्त कर चुके हैं) द्वारा बोले या लिखे जाते हैं। पैगनों के गुरु का ज्ञान आत्मज्ञान के उस उच्च आध्यात्मिक स्तर को प्राप्त नहीं कर सकता है, इसलिए उनकी शिक्षाएं केवल बौद्धिक शब्द भण्डार हैं। उन्हें सूत्र नहीं कहा जा सकता। क्यों? क्योंकि उनकी शिक्षाओं में सम्यक् दृ0, उन्हीं शिक्षाओं को सूत्र कहा जा सकता है, जो बुद्ध, अर्हत् और बोधिसत्व जैसे प्रबुद्ध लोगों (जो शून्य-प्रज्ञा प्राप्त कर चुके हैं) द्वारा बोले या लिखे जाते हैं। पैगनों के गुरु का ज्ञान आत्अहंकार की ओर ले जाता है (जैसा कि ईसाईयों के बाइबिल से पता चलता है कि जब किसी ने ईश्वर के शिष्य को ऋषि कह दिया तो उनकी बात को तुरंत यह कहकर सुधारा गया था: “ईश्वर के कारण मुझे ऋषि मत कहो, कोई भी ऋषि कहलाने का हकदार नहीं है” ल्यूक के न्यू टेस्टामेंट की पुस्तक का एक उद्धरण) अथवा धर्म की आसक्ति के कारण वे पतित हो गए (ईसाई बाइबिल के अनुसार मेरा धर्म एक प्रतिज्ञान के मामले में सबसे अच्छा है: “मैं एक जीवन, एक मार्ग, एक सच्चाई हूँ। केवल मैं ही नहीं, कोई भी पिता के पास नहीं आ सकता”)।

बौद्ध शास्त्रों के अनुसार, बुद्ध की ओर से प्रकट की गई “चार आर्य सत्यों” (चार सर्वोच्च सत्य) वाली सम्यक् दृष्टि, मिथ्या दृष्टि के जंगल में सिंहगर्जना सदृश है, पैगन टिप्पणीकारों में से कोई भी उसका प्रतिकार नहीं कर सकता है, बौद्ध शास्त्रों में ऐसे साक्ष्य मिलते हैं कि पैगन ताओवादी कई मामलों में बुद्ध से बात करने के लिए आते थे, तब उन्होंने आत्मसमर्पण करते हुए बुद्ध के शिष्यत्व को स्वीकार किया, इन उपाख्यानों में सबसे प्रसिद्ध उदाहरण पैगन कात्यायन ब्राह्मण का है, जो बाद मA4्यक् दृष्टि, मिथ्या दृष्टि के जंगल में सिंहगर्जना सदृश है, पैगन टिप्पणीकारों में से कोई भी उसका प्रतिकार नहीं कर सकता है, बौद्ध शास्त्रों में ऐसे साक्ष्य मिलते हैं कि पैगन ताओवादी कई मा4र विभिन्न ज्ञानियों की व्याख्याओं को यदि हम अपने पूरे मानव जीवन में पढ़ने या उन्हें सुनने में भी बिताएं तो भी हम उन्हें बिल्कुल भी समाप्त नहीं कर पाएंगे। यह बताता है कि ईसाई न्यू टेस्टामेंट बाइबल खरीदने वालों की संख्या सबसे अधिक क्यों है। क्योंकि ईसाई न्यू टेस्टामेंट बाइबिल पर केवल एक पुस्तक है। बौद्ध धर्म में, कई अलग-अलग संप्रदाय और अलग-अलग स्कूल हैं जो विभिन्न प्राणियों की निश्चित पृष्ठभूमि के साथ उपयुक्त हैं, फिर विभिन्न संप्रदायों के अनुसार अलग-अलग सूत्र हैं। इसलिए, हम बौद्ध धर्म सीखने वाले लोगों की सही संख्या कैसे जान सकते हैं? हम यह भी पता लगा सकते हैं कि बौद्ध शास्त्रों की विशालराशि में से सम्यक् दृष्टि को कैसे एकीकृत किया जाए? यह देखते हुए कि बौद्ध अनुयायियों के बीच असहमति होगी, बुद्ध ने दृष्टिकोण और स्पष्टीकरण के साथ बौद्ध सूत्रों की प्रामाणिकता को सत्यापित करने के लिए मापदंड बताया:

मूल्यांकन मापदंड: वे सूत्र जिन्हें प्रामाणिक कहा जाता है और जो बौद्ध सिद्धांतों की शरण बताते हैं, निम्न बातों पर निर्भर करते हैं:

1, प्रबुद्ध पथ के तीन प्रमुख पहलू: त्याग, बोधिसत्व और शून्यता

2, चार धर्मपद हैं जो चार विशेषताएं हैं, जो सच्चे बौद्ध शिक्षण को दर्शाती हैं। ऐसा कहा जाता है कि यदि किसी भी एक शिक्षण में चार धर्मपद शामिल हैं तो इसे बुद्ध धर्म माना जा सकता है, हालांकि इन चारों धर्मपदों को गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद सभी के लिए बताया गया है।

चार धर्मपद में शामिल हैं: (1) सभी संस्कार शून्य हैं, (2) सभी संस्कार दुःखपूर्ण हैं, (3) सभी संस्कार अनित्य हैं, (4) निर्वाण सच्ची शांति है। इनमें से प्रथम और द्वितीय शून्यता के रूप में माना जा सकता है, तीसरा त्याग के रूप में; और चतुर्थ बोधिचित्त के रूप में।

चारों धर्मपद इस प्रकार हैं:

* सभी संस्कार शून्य हैं: सभी संस्कार अनात्म, सापेक्ष और क्षणिक हैं।

* सभी संस्कार दुःखपूर्ण हैं: सभी अनुकूलित घटनाएं और अनुभव असंतोषजनक हैं

* सभी संस्कार अनित्य हैं: सभी धर्म और उनके कार्य प्रकृति में अनित्य हैं। सब कुछ बीज के अभिसरण और परिपक्व होने की स्थिति का परिणाम है। परिवर्तित स्थितियां भी बदल रही हैं, – कुछ भी स्थायित्व नहीं है।

* निर्वाण ही सच्ची शांति है: निर्वाण परम शांति है। निर्वाण द्वैत और सापेक्षता की सभी शर्तों से परे है। इसलिए यह अच्छे और बुरे, सही और गलत, अस्तित्व और अनस्तित्व की हमारी धारणाओं से परे है।

3, चार प्रतिशरणों को स्वीकार करने का सिद्धांत- धर्म के चार विश्वास हैं- बौद्ध धर्म को पूरी तरह से समझने के लिए चार बुनियादी सिद्धांत:

* धर्म पर भरोसा करना, इसे उद्घाटित करने वाले लोगों पर नहीं (धर्मप्रतिशरणता न पुद्गलप्रतिशरणता) – कानून में भरोसा, न कि पुरुषों में- शिक्षण पर भरोसा करना, किसी भी व्यक्ति पर नहीं (केवल शिक्षण पर भरोसा करना और उसे सिखाने वाले व्यक्ति पर नहीं)।

* अर्थ पर भरोसा करना, सिर्फ शब्दों पर नहीं (अर्थप्रतिशरणता न व्यञ्जनप्रतिशरणता) – सच्चाई पर भरोसा करना, शब्दों (अक्षरों) पर नहीं। सूत्र में धर्म कथन के सही अर्थ या भाव पर भरोसा करना, केवल कथन के शब्दों पर नहीं (शिक्षण के अर्थ पर निर्भर होना और अभिव्यक्ति पर नहीं)। बुद्ध की शिक्षाओं में उपयोग किए जा रहे शब्दों से नहीं जुड़ने के उदाहरणों का प्रदर्शन किया गया है क्योंकि कई मामले ऐसे भी हैं कि बौद्ध सूत्रों में मिलावट की गई है और मनगढंत शब्द गढ़ लिए हैं।

* नीतार्थ पर भरोसा करें, नेयार्थ पर नहीं (नीतार्थप्रतिशरणता न नेयार्थप्रतिशरणता)- उन सूत्रों पर भरोसा करें जो हमें निर्वाण की ओर ले जाते हैं, उन पर भरोसा न करें जो नहीं ले जाते। परम सत्य वाले सूत्रों पर भरोसा करें, अधूरों पर नहीं। परम शिक्षा देने वाले सूत्रों पर भरोसा करें, उन लोगों पर नहीं जो केवल उपदेशात्मक शिक्षाओं का प्रचार करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप मानव, ईश्वर, असुर, पशु और प्रेत का पुनर्जन्म होता है।

* ज्ञान पर भरोसा, चेतन और धारणा पर नहीं (ज्ञानप्रतिशरणता न विज्ञानप्रतिशरणता) – ज्ञान में भरोसा और भ्रामक ज्ञान में अविश्वास शाश्वत सत्य से बढ़ता है। सहज ज्ञान पर भरोसा करें, बौद्धिक या सामान्य समझ पर नहीं। ज्ञान प्राप्ति के लिए बुद्धि ही शुद्ध ज्ञान है। चेतना एक सांसारिक धारणा है जो खराब बीजों और पुनर्जन्म एवं मृत्यु के चक्र के लिए उत्पन्न परिस्थितियों का कारण बनती है। इस प्रकार, बौद्ध सूत्रों की प्रामाणिकता को समझकर ज्ञान को आधार बनाना चाहिए, साधकों को किसी भी बौद्ध शिक्षा की प्रशंसा या बुराई करने के लिए अपनी भावना और अपने स्वयं के विचारों पर भरोसा नहीं करना चाहिए।

एक बड़े पैमाने पर और अनंत मात्रा में सूत्रों की उपलब्धता के कारण, बौद्ध शास्त्रों को पढ़ने के लिए क्या हमारे पास पर्याप्त समय और पर्याप्त मस्तिष्क शक्ति है; सम्यक् दृष्टि के साथ एकीकृत करने और समझने के लिए? मैं मन की शक्ति, प्रतिज्ञा की शक्ति और बौद्ध शास्त्रों से ज्ञान की शक्ति का उपयोग करता हूँ और उपर्युक्त सिद्धांतों और मापदंडों के अनुसार बौद्ध धर्म में प्रबुद्ध लोगों की शिक्षाओं से आता को समझकर ज्ञान को आधार बनाना चाहिए, साधकों को किसी भी बौद्ध शिक्षा की प्रशंसा या बुराई करने के लिए अपनी भावना और अपने स्वयं के विचारों पर भरोसा नहीं करना चाहिए।

एक बड़े पैमाने परA5 लिए सूत्र पढ़ना और उन्हें समझना आसान हो जाए और आपको मंदिरों पर ज्यादा समय बिताने की जरूरत न पड़े। जैसा कि चीनी तांग राजवंश में राष्ट्रीय शिक्षक हुईजोंग (Huizhong) ने मंदिर में सूत्र पढ़ने और अध्ययन करने में 45 साल बिताए और एक अन्य मामला मास्टर यिन-गुआंग का था, जिन्होंने 20 साल मंदिर में बौद्ध धर्मग्रंथों का अध्ययन करने में बिताए।

इस लेख को पढ़ते हुए, आपको यह जान लेना चाहिए कि chanhtuduy.com की वेबसाइट में लेखों की बड़ी मात्रा में बौद्ध धर्म से जुड़ी घटनाओं, संस्कारों और पहलुओं को प्रतिबिंबित किया गया है जो धर्म की दाईं कक्षा में 2,500 तक हैं। सभी लेखों में पूर्ण सम्यक् दृष्टि के समस्त आध्यात्मिक पक्षों का निदर्शन होता है, जिनमें पूजा पर सम्यक् दृष्टि, श्रद्धा पर सम्यक् दृष्टि, नज़रिए पर सम्यक् दृष्टि और मुक्ति पर सम्यक् दृष्टि सम्मिलित हैं। मुझे हमारे स्मरणीय और अत्यंत लाभकारी आध्यात्मिक कार्यों पर भी गर्व है और आप सभी ने भी अपने स्वयं के लेखों द्वारा इस आध्यात्मिक कार्य में योगदान दिया है और हर साल मैंने आपके योगदान का मूल्यांकन किया है। कुछ उत्कृष्ट और संभावित लेखन हैं जैसे कि मैट कीन, मैट टू, मैट थ्यू, मैट डाइंग हैंग, मैट है, मैट हान्ह, गिआक, मैट ह्यू फैप, मैट टिन्ह डंग, और इसी तरह सबसे उत्कृष्ट है मैट डिउ का लेखन जो कि सम्यक् दृष्टि से भरा हुआ है।

Chanhtuduy.com का हमारा महल पारंगत ज्ञान वाले बौद्ध गुरु विमलकीर्ति के महल के समान है। उन्होंने सावक (श्रावक), प्रत्येक-बुद्ध, बोधिसत्वों और देवताओं, देवों, असुरों, नागराजों (ड्रैगन राजाओं), दानव राजाओं – इन सभी का अपने महल के एक छोटे से कमरे में अभिवादन किया, लेकिन धर्म की बात सुनने के लिए हमेशा उनके पास पर्याप्त कमरे थे। इसी तरह, आपके स्मार्टफोन में बस एक क्लिक पर, आप सभी लिंक को खोलते हैं और लेख पढ़ते हैं, फिर आप अपने आप को अलग-अलग स्तरों में आंशिक रूप से या पूरी तरह से, व्यापक रूप से और समग्रता से सम्यक् दृष्टि से सुसज्जित कर लेते हैं।

हालांकि, यह तथ्य है कि प्रत्येक महानता का बीज छोटा ही होता है, थोड़ा और प्रायः पर्स को भरने वाला होता है, छोटी बूंदें टैंक को पूरा भर देती हैं, बेहतर परिणाम के लिए chanhtuduy.com पर लेखों को निरन्तर बिना रुकावट और ईमानदारी से पढ़ना और टिप्पणियाँ करना आवश्यक है। यदि आप 50 लेख पढ़ते हैं और टिप्पणी करते हैं और उसके बाद आप पढ़ना बंद कर देते हैं, 2 महीने बाद आप इसे फिर से पढ़ना शुरू करते हैं, तो आपको कुछ नहीं मिलेगा। क्योंकि यह वही मामला है कि आप टैंक में 500 बूंदें डालते हैं और आप रुक जाते हैं। दो महीने बाद, टैंक में पानी नहीं है क्योंकि 2 महीने पहले डाले गए पानी की मात्रा वाष्पित हो चुकी है। आपको शुरू से ही टैंक में बूंदें गिराना शुरू कर देना चाहिए। इसलिए, आप सभी पूरी तरह से और समग्रता से सम्यक्  दृष्टि से सुसज्जित (लैस) होना चाहते हैं, आपको हर दिन, हर महीने, हर साल लगन से पढ़ना और टिप्पणी करना चाहिए। मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि अगर कोई शानदार महल में प्रवेश करता है और स्केच के माध्यम से ऊपर से नीचे तक सब कुछ देखता है, जब बाहर कदम रखता है तो  क्या वह सोच पाएगा कि वह खुद पूरी तरह से दौरा कर चुका है और महल की सुंदरता के बारे में वह एक गहरी भावना रखता है? यही कारण है कि मैंने खुद को सम्यक् दृष्टि प्राप्त करने के लिए नियमित रूप से chanhtuduy.com पर लेख पढ़ने के लिए आप सभी को याद दिलाया है। मुझे इतना गंभीर होना होगा कि मुझे आपकी वज्र आलोचना करनी होगी और आपको चेतावनी के रूप में आपका हिस्सा वापस लेना होगा। मैंने जाना है कि कई शिष्यों और शिक्षार्थियों ने मुझ पर क्रोध किया, यहाँ तक कि मुझ पर दोष भी लगाया है या मेरे कार्यों के लिए कठोर शब्दों का उपयोग भी किया है जो कि मेरे प्रति आपकी दया के कारण हैं। मैं अप्रसन्न नहीं हूँ क्योंकि मुझे पता है कि सभी प्राणियों को कारण और प्रभाव के कानून से प्रभावित किया जाता है, वे जो बोते हैं वही काटते हैं। गुरु के प्रति नकारात्मक विचार होने पर वे प्रायश्चित नहीं करेंगे और तांत्रिक प्रतिज्ञाओं के पहले उपदेश को तोड़ेंगे तो उन्हें परिणाम मिलेगा क्योंकि गुरु पाबोंगका ने चेतावनी दी थी कि जब आप एक चींटी को मारते हैं और यदि आप एक बार भी प्रायश्चित नहीं करते हैं, तो 15 दिन बाद में आपके बुरे कर्म उतने ही गंभीर होंगे जितने कि एक मुर्गे को मारने पर होते हैं, एक महीने के बाद आपके बुरे कर्म गाय को मारने के बराबर प्रभावी होंगे, 6 महीने के बाद ये एक इंसान की हत्या करने जितने भारी होंगे। यदि आप गुरु का अनादर करके पहला उपदेश तोड़ते हैं और आप प्रायश्चित नहीं करते हैं, तो आपको इसका गंभीर परिणाम मिलता है! अरे, नहीं! यदि आप गुरु का अनादर करते हैं तो इसके परिणामों के बारे में अधिक विस्तार से लिखने की हिम्मत मुझमे नहीं है। जब आप पाठ 4 में वर्णित छह बुरे परिणामों के बारे में सोचते हैं तो आप स्पष्ट रूप से समझेंगे: (1) लगन से काम करोगे लेकिन परिणाम बहुत कम मिलेगा, (2) न तो धर्मनिरपेक्ष जीवन और न ही साधना सफल होगी, (3) स्वयं (आत्म-आसक्ति) से और धर्म (धर्म-आसक्ति) से चिपके रहोगे, (4) शरीर और मन के भीतर एकत्रित नकारात्मक वेदनाओं और भावनाओं के कारण उदास या हर्षित चेहरा बना रहेगा, (5) अप्रत्याशित जोखिमों का सामना करना होगा और (6) बुद्ध की भूमि में पुनर्जन्म लेने का दुर्लभ अवसर नहीं मिलेगा।

सम्यक् दृष्टि कैसी हो, यह एक आध्यात्मिक प्रयास है, लेकिन सम्यक् दृष्टि को कैसे स्पष्ट बनाया जा सकता है, इसका मतलब ज्ञान के प्रकाश को कम से अधिक और निकट से दूर तक व्याख्यायित करते हुए उद्घाटित करना है और शुद्ध मन योग की भावनानुसार व्याख्या एवं निर्धारित करने के लिए एक मुद्दा है। मैं इसे पाठ संख्या 6 में प्रस्तुत करूंगा। कृपया इसे पढ़ने के लिए प्रतीक्षा करें। मैं बुद्ध के स्वभाव का आनंद प्राप्त करने के लिए सभी प्राणियों से प्रार्थना करता हूँ।

ओं मणि पद्मे हूं

 

लेखक – थिनले गुयेन थान (फु वान पर्वत की चोटी पर एक बरसात की दोपहर में, 14 जनवरी 2019)

अनुवादक- डॉ. विकास सिंह (भारत के बिहार के दरभंगा में स्थित ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में संस्कृत के सहायक आचार्य हैं।)


अंग्रेजी अनुवाद:  LÀM SAO ĐỂ ĐƯỢC TRANG BỊ CHÁNH KIẾN TOÀN DIỆN?

वियतनामी मूल: HOW TO BE EQUIPPED WITH THE FULL RIGHT VIEW


THANH TRI – THE 2ND MIND DHARMA: SAMYAGDRSTI – PRABHA SAMADHI

PART 1: INTRODUCTION

PART 2: WHAT IS RIGHT VIEW?

PART 3: RIGHT VIEW IN DIFFERENT ASPECTS”

PART 4: GAIN FROM RIGHT VIEW, LOSE OF WRONG VIEW

PART 5: HOW TO BE EQUIPPED WITH THE FULL RIGHT VIEW

PART 7:  HOW TO TURN THE BRILLIANT LIGHT (PRABHA) INTO SAMADHI? 

PART 8:  THINGS TO NOTICE AS YOU PRACTICE SAMYAGDRSTI – PRABHA SAMADH

PART 9:  HOW DOES THE 2NDMIND DHARMA WORK?

PART 10:  WORDS FROM A MAN WHO WISHES TO BE THE 3RD HARDLY MET PERSON


Đệ nhị Tâm pháp Thanh Trí CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI:

Bài 1: LỜI NÓI ĐẦU

Bài 2: THẾ NÀO GỌI LÀ CHÁNH KIẾN?

Bài 3: NHỮNG GÓC TƯ DUY VỀ CHÁNH KIẾN 

Bài 4: ÍCH LỢI TỪ CHÁNH KIẾN, TÁC HẠI TỪ TÀ KIẾN

Bài 5: LÀM SAO ĐỂ ĐƯỢC TRANG BỊ CHÁNH KIẾN TOÀN DIỆN?

Bài 6: LÀM SAO ĐỂ CHÁNH KIẾN ĐƯỢC QUANG MINH?

Bài 7: LÀM SAO ĐỂ QUANG MINH THÀNH TAM MUỘI?

Bài 8: NHỮNG LƯU Ý CẦN BIẾT KHI ĐẾN VỚI CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI

Bài 9: CƠ CẤU VẬN HÀNH CỦA TÂM PHÁP “CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI”

Bài 10: TÂM SỰ CỦA KẺ LUÔN MONG ĐƯỢC NOI GƯƠNG HẠNG NGƯỜI THỨ BA

 

  1. Tantra Dharmapabodhisita says:

    Dear H.H. Guru,

    Thanks for showing us the path how to be equipped with the full RIGHT VIEW or Samyak Dṛṣṭi. You have beautifully explained in your enlightened words, “If mentioning about the number of sutras given by the Buddha, though we spend our whole human life reading or listening to them, we cannot finish them at all, let alone the teachings and viewpoints of other Buddhist enlightened ones.” And, thus, Guru is essential in our life for guiding us the right path. The first time, I had read about four Dharma seals in my post-graduate in 2010. Dear Guru, thank you for your interpretation of gaining the essence of Śūnya (Empty), Duḥkha (Suffering), Anittya (impermanent) and Nirvāṇa.

    The interpretation of four reliance principles is very heart-opening. These are very tough to understand, but you have explained these very well due to your pious heart. They are – Relying on the meaning, not just on the words (dharmapratiśaraṇatā na pudgalapratiśaraṇatā),  Rely on the complete teaching, not on the partial teaching (arthapratiśaraṇatā na vyañjanapratiśaraṇatā), Rely on the wisdom, not on the conscious and perception (nītārthapratiśaraṇatā na neyārthapratiśaraṇatā) and  Rely on the wisdom, not on the conscious and perception (jñānapratiśaraṇatā na vijñānapratiśaraṇatā).

    And in the last of this article, you told us the importance of Guru and his words. Thanks (Puṇyānumodana) for equipping us with the right view and clearing everything in precisely and beautifully.

    The word GURU’s, ‘Gu’ means darkness and ‘Ru’ means remover or alleviator. So you are one who removes our ignorance and makes our life happy, comfortable, enlightened and blessed. In this sense, you are our Guru, and we are delighted to be your pupil.

    Tantra Dharmapabodhisita

    • Admin
      Nguyên Thành says:

      Thank you for your nice words.
      Thanks to Buddha’s teachings, we have a close connection on the path of enlightenment.
      I am a humble Guru to have a good pupil like you, who has a noble commitment and effort to help other beings to access to the holy Dharma.
      May your wishes of application Bodhichitta come true soon.
      My English is not good enough. If I write something incorrect, please understand.

  2. Tantra Dharmapabodhisita says:

    Dear H.H. Guru

    Thanks for your kind and generous words. I am very fortunate that I am your pupil. 

  3. Tantra Dharmapabodhisita says:

    🙏🙏🙏

  4. Admin
    Mật Diệu Hằng says:

    Kính bạch Thầy!

    Con xin phép được dịch comment của đạo hữu Tantra Dharmapabodhisita sang tiếng Việt như sau:

    Kính bạch Thầy tôn quý!

    Con cảm tạ ơn Thầy đã chỉ dạy chúng con phương thức để có được chánh kiến toàn diện. Thầy minh giảng tuyệt vời với những lời dạy soi sáng chúng con: “nếu nói về số lượng kinh điển do Đức Phật tuyên thuyết, chúng ta dành toàn bộ thời gian của kiếp người này, cũng không nghe hết và đọc hết được; chưa kể đến kinh điển, luận điển của các bậc Thánh đức đạo Phật”. Và do vậy, Đạo sư đóng vai trò thiết yếu trong cuộc sống của chúng con, chỉ dẫn chúng con con đường chánh pháp.

    Kính bạch Thầy! Lần đầu tiên con đọc về tứ pháp ấn khi con học sau đại học năm 2010. Con cảm tạ ơn Thầy đã luận giảng cho con hiểu thực nghĩa về Tánh không, Khổ đau, Vô thường và Niết Bàn.

    Những luận giảng của Thầy về tứ y cứ thật sâu rộng. Những điều này vốn rất khó hiểu những qua luận giảng của Thầy những điều này trở nên đơn giản và dễ hiểu nhờ tâm đạo của Thầy. Đó là y nghĩa bất y ngữ, y liễu nghĩa bất y bất liễu nghĩa, y trí bất y thức, y pháp bất t nhân.

    Và cuối cùng, Thầy nhấn mạnh tầm quan trọng của Đạo sư và lời dạy của đạo sư.

    Con cảm tạ ơn Thầy đã trang bị cho chúng con chánh kiến và luận giảng mọi điều thật chính xác và tuyệt vời.

    Con hiểu rằng từ “Đạo sư” có nghĩa là người xua tan bóng tối vô minh. Thầy chính là người xóa tan sự vô minh trong chúng con và giúp chúng con có được cuộc sống hạnh phúc, thoải mái, Thầy gia trì cho chúng con và giúp chúng con được giác ngộ. Và vì vậy, Thầy chính là Đạo sư của chúng con và chúng con rất hoan hỷ được là học trò của Thầy.

    Con – Tantra Dharmapabodhisita.

     

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