May 22, 2020

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सप्तम लेखः प्रकृष्ट प्रकाश (प्रभा) को समाधि में कैसे परिवर्तित करें (Đệ nhị Tâm pháp Thanh Trí: CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI Bài 7: LÀM SAO ĐỂ QUANG MINH THÀNH TAM MUỘI?)

वियतनाम के गुरु थिनले गुयेन थान द्वारा ‘द्वितीय मानसिक धर्म श्रृंखला’ का “सम्यक् दृष्टि- प्रभा समाधि” विषयक सप्तम लेख: ‘प्रकृष्ट प्रकाश (प्रभा) को समाधि में कैसे परिवर्तित करें’)

सप्तम लेखः प्रकृष्ट प्रकाश (प्रभा) को समाधि में कैसे परिवर्तित करें

भाग 6 में, मैंने तर्क दिया है कि कैसे सम्यक् दृष्टि को “प्रकृष्ट प्रकाश” (प्रभा) में बदला जाए। हम यह भी जानते हैं कि बुद्ध की बुद्धिमत्ता के प्रकाश को प्राप्त करने के लिए हमें क्या अभ्यास करना चाहिए। रूपवान् विश्व (रूपधातु) में देवताओं की तुलना में बौद्ध साधकों की बुद्धि के प्रकाश की चमक अत्यधिक उत्कृष्ट है, क्योंकि यह बुद्ध की सम्यक् दृष्टि से निर्मित है और बुद्ध द्वारा दसों दिशाओं में उत्कृष्ट रूप से धन्य हुई है। यह बल्ब, सूरज, चाँद या लौ से चमकने वाली रोशनी की तरह नहीं है। बुद्ध ने सिखाया है कि ज्ञान का प्रकाश सर्वोत्कृष्ट प्रकाश है जिसे सम्यक् दृष्टि के “क्वांटम कण” द्वारा निर्मित किया जाता है, जिसे माइक्रोस्कोप द्वारा नहीं देखा जा सकता है लेकिन इस तरह से: “वह उस स्तर पर आ जाता है जहां उसे ज्ञान के प्रकाश से सम्मान मिलता है। वह प्रकाश की प्रभावशाली (मजबूत) तरंगों (विकिरण जीवविज्ञान) को उत्सृजित करता है जो अन्य लोगों को प्रभावित करने और सम्मान पाने में सक्षम हैं। एक बार जब साधक पूरी तरह से सम्यक् दृष्टि से सुसज्जित हो जाता है, तो वह तदनुसार प्रकाश (प्रभा) प्राप्त करेगा जो परेशानी के समय में भी अच्छे कर्ेखा जा सकता है लेकिन इस तरह से: “वह उस स्तर पर आ जाता है जहां उसे ज्ञान के प्रकाश से सम्मान मिलता है। वह प्रकाश की प्रभावशाली (मजबूत) तरंगों (विकिरण जीवविज्ञान) को उत्सृजित करता है जो अन्य लोगो%Eमाधि” कहा जाता है’ में वर्गीकृत किया है। पालि भाषा के शब्द “समाधि” (चीनी में 三昧) का अर्थ है मन की गहन एकाग्रता। ध्यान में साधक की मनःस्थिति नौ अवस्थाओं से गुजरने के बाद, मन की ओर अग्रसर होने, निरंतर अग्रसर होने, मन के स्थिर होने, सही ढंग से स्थिर होने… (निरोध समापत्ति) तक एक निरोध समापत्ति को प्राप्त होती है।

हालाँकि, सम्यग्दृष्टि-प्रभा-समाधि के अभ्यास में, हम दृश्य वस्तुओं (कसिण) का उपयोग नहीं करते हैं, जैसे नील कसिण, पीत कसिण, लाल, सफेद, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि या अंतरिक्ष… लेकिन हम सम्यक् दृष्टि को हमारे कसिण के रूप में लेते हैं जिस पर हम अपने मन को भाग से, संपूर्ण भाग से पूर्णता (एक-बिंदु) पर स्थिर करते हैं। इसलिए, सम्यक् दृष्टि से प्राप्त की गई समाधि, समथ और विपस्सना दोनों के संयोजन का परिणाम है। सम्यक् दृष्टि समाधि (सम्यकग्दृष्टि-प्रभ3श्य वस्तुओं (कसिण) का उपयोग नहीं करते हैं, जैसे नील कसिण, पीत कसिण, लाल, सफेद, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि या अंतरिक्ष… लेकिन हम सम्यक् दृष्टि को हमारे कसिण के रूप में लेते हैं जिस पर हम अपने मन को भाग से, संपूर्ण भाग से पूर्णता (एक-बिंदु) पर स्थिर करते हैं। इसलिए, सम्यक् दृष्टि से प्राप्त की गई समाधि, समथ और विपस्सना दोनों के संयोजन का परिणाम है। सम्यक् दृष्टि समाधि (सम्यकग्दृष्टि-प्रभA4हे।

जब हम किसी से परिचित होते हैं, तो हम उसके बारे में संक्षिप्त जानकारी जैसे लिंग, आयु या व्यवसाय को जानते हैं। करीब जाने के बाद, हम फोन नंबर, कार्यालय का पता, घर, शौक या शिक्षा के बारे में अधिक जानते हैं। जब हम युगल (या और अधिक करीबी दोस्त) बन जाते हैं, तो हम उनके बारे में व्यक्तिगत से लेकर पारिवारिक या सामाजिक पहलुओं तक सब कुछ जान जाते हैं। तब हम कुछ मामलों में, वास्तव में उनसे संबंधित किसी भी चीज का आकलन करते हैं, जानते हैं और समझते हैं।

फिर भी, इसी क्रम में “उत्कृष्ट प्रकाश” (प्रभा) को “समाधि” बनाने के लिए, जब प्रकाश की तरंगों को एक मणि के समान द्रव्यमान में निर्मित किया जाता है जो रात में चमक पैदा करती हैं और कैसे साधक सम्यक् दृष्टि से रहता है, सम्यक् दृष्टि के साथ धर्म के मामलों का आचरण करता है और संसार रुपी नदी को पार करने के लिए “प्रज्ञा रुपी-नाव” में सम्यक् दृष्टि का उपयोग करता है (भाग 6 से उद्धृत), हमें निम्नलिखित पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए: यह वह चरण है जब साधक एकाग्रता की स्थिति तक पहुँचता है और उसका मन “सम्यक् दृष्टि के उत्कृष्ट प्रकाश” से युक्त होता है। वह हमेशा “अपने मन की कौन सी स्थिति है” को मानता है, कहते हैं कि वह सम्यक् दृष्टि में रहता है, सम्यक् दृष्टि को अपना करीबी दोस्त मानता है जो हमेशा उसका साथ देती है। वह शरीर, वाणी और मन के व्यवहार के लिए ध्रुवतारे के रूप में सम्यक् दृष्टि को लेता है और इसके विपरीत क्रम में भी (वह सम्यक् दृष्टि के अनुसार ही व्यवहार करता है)। इस स्तर पर, उसे त्रिरत्नों की शरण लेने के आठ धर्मों का अच्छा अभ्यास हो जाता है। विशेष रूप से और बौद्ध धर्म में थान त्रि योग में, त्रिरत्न में शरण लेने के आठ धर्मों में निम्नलिखित नियम और अभ्यास शामिल हैं:

1) बुद्ध की शरण लेते हुए, हम “देवों, असुरों, दानवों और वस्तुओं” के सामने पूजा या प्रणाम नहीं करते।

2) धर्म की शरण लेते हुए, हम किसी भी सत्त्व या प्राणी को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं और न ही मारते हैं।

3) संघ की शरण लेते हुए, हमें (आध्यात्मिक पहलू में) मूर्तिपूजकों के साथ घनिष्ठ संबंध नहीं रखने चाहिए।

4) प्रत्येक दिन त्रिरत्नों की शरण लें।

5) हम जिस दिशा में जाना चाहते हैं, वहां त्रिरत्नों की शरण लें।

6) गुरु के संचरण क्षेत्र के माध्यम से हमेशा त्रिरत्नों के आशीर्वाद के स्रोत से अवगत रहें।

7) अगर, त्रिरत्नों की शरण लेने के बाद, हम मुसीबतों या कठिनाइयों से मिलते हैं, तो उन्हें शांति से एक प्रकार की शुद्धि के रूप में देंखे, क्योंकि ये दुर्घटनाएं इस जीवन में हमारे कारण नहीं होती हैं, लेकिन वे पिछले जन्मों के कर्म के बीज हैं जो अनिवार्य रूप से फलते हैं और पकते हैं।

8) गुरु त्रिरत्नों का प्रतिनिधित्व करता है। गुरु के प्रति समर्पण आत्मज्ञान की नींव है।

“गुरु बुद्ध की तुलना में अधिक उदार हैं। उनके शब्द सूत्र से अधिक महत्वपूर्ण हैं”(अतिश)।

यदि “सम्यक् दृष्टि के उत्कृष्ट प्रकाश” (सम्यग्दृष्टि-प्रभा) को परीक्षण और अभ्यास के चरण के रूप में देखा जाए, तो “सम्यक् दृष्टि समाधि” (सम्यग्दृष्टि-समाधि) धर्म का अनुप्रयोग है, जैसा कि वज्रयान में कहा गया है, व्यवहृत बोधिचित्त “सभी भावुक प्राणियों के लाभ” के आधार पर होता है। बुद्ध और अर्हतों की शिक्षाओं के आधार पर, साधक प्रत्येक विषय या परिस्थिति पर उचित प्रमाणमीमांसा और पद्धति के आधार पर लचीले ढंग से और प्रभावी ढंग से बोध%Bप्राणियों के लाभ” के आधार पर होता है। बुद्ध और अर्हतों की शिक्षाओं के आधार पर, साधक प्रत्येक विषय या परिस्थिति पर उचित प्रमाणमीमांसा और पद्धति के आधार पर लचीले ढंग से और प्रभावी ढंग से बोधऺ5नता महसूस नहीं करता है, हालांकि यह उपदेशों से विरोधाभास दिखाता है, क्योंकि वह मुक्ति की सम्यक् दृष्टि और कार्य-कारण के सिद्धांत को अच्छी तरह से समझता है। सम्यक् दृष्टि समाधि के स्तर पर, साधक हमेशा अच्छे, बुरे या तटस्थ (न तो अच्छे और न ही बुरे) के प्रति संवेदनशील होता है, चाहे वे किसी भी अभिव्यक्ति के बावजूद हो। दान देना, भिक्षा देना, चढ़ावा करना, पूजा करना, पश्चाताप करना, बुद्ध के नाम का जप या मंत्र पाठ जैसी गतिविधियाँ बौद्ध जैसी प्रतीत होती हैं लेकिन वास्तव में, उन्हें निम्नलिखित 14 विफलताओं में पड़ने के कारण बौद्ध धर्म नहीं माना जाता है:

  1. यदि एक इंसान के रुप में पैदा होने के बाद भी कोई (व्यक्ति) किसी भी पवित्र सिद्धांत (धम्म) पर कोई ध्यान नहीं देता है, तो वह कीमती रत्नों से समृद्ध भूमि से खाली हाथ लौटने वाले इंसान की भांति ही दिखता है; और यह एक गंभीर विफलता है।
  2. यदि पवित्र संघ के द्वार में प्रवेश करने के बाद, कोई व्यक्ति गृहस्थ जीवन में लौटता है, तो वह एक दीपक की लौ में डुबकी लगाने वाले पतंगे जैसा दिखता है; और यह एक गंभीर विफलता है।
  3. एक तत्त्वदर्शी के साथ रहने के बाद अज्ञान में रहने वाला मनुष्य एक झील के किनारे प्यास से मर रहे आदमी की तरह होता है; और यह एक गंभीर विफलता है।
  4. आध्यात्मिक अभ्यास करने के बाद यदि उसका उपयोग चार प्रकार के बुरे कर्मों (जीवित प्राणियों को मारना, चोरी करना, यौन दुराचार और असत्य बोलना) को दूर करने के लिए नहीं किया जाता है, तो एक पेड़ के तने के खिलाफ (तने की लकड़ी से बनी) कुल्हाड़ी की तरह ही होता है; और यह एक गंभीर विफलता है।
  5. नैतिक उपदेशों को जानने के बाद भी यदि कोई व्यक्ति उन्हें स्पष्ट उत्साह के साथ प्रयोग नहीं करता तो वह उस रोगग्रस्त व्यक्ति की तरह होता है जो दवाई का एक बैग ले जाता है किन्तु उसका वह कभी उपयोग नहीं करता है; और यह एक गंभीर विफलता है।
  6. यदि कोई व्यक्ति धर्म का उपदेश देता है किन्तु स्वयं अभ्यास नहीं करता है तो वह तोते की तरह रटना मात्र है; और यह एक गंभीर विफलता है।
  7. चोरी, डकैती या छल से प्राप्त चीजों को यदि कोई भिक्षा और दान में देता है, तो वह सादे पानी में एक चमड़े से निर्मित कोट को धोने की कोशिश करने जैसा है; और यह एक गंभीर विफलता है।
  8. जीवित प्राणियों की हत्या करके प्राप्त मांस को देवताओं को चढ़ाने वाला व्यक्ति वैसा ही होता है जैसा कोई एक माँ को उसके ही बच्चे के मांस को चढ़ाए; और यह एक गंभीर विफलता है।
  9. दूसरों के लिए अच्छा करने की बजाय केवल स्वार्थपूर्ण तरीके से अंत तक धैर्य बनाए रखने वाला व्यक्ति उस बिल्ली की तरह होता है जो चूहे के इंतजार में रहती है; और यह एक गंभीर विफलता है।
  10. केवल प्रसिद्धि और प्रशंसा पाने के लिए मेधावी कार्यों को करना वैसा ही है जैसे बकरी के गोबर की एक गोली (मैंगनी) के स्थान पर मणि की इच्छा करना; और यह एक गंभीर विफलता है।
  11. अगर, सिद्धांत के बारे में बहुत कुछ सुनने के बाद, किसी का स्वभाव नहीं बदलता है तो वह एक भयंकर बीमारी से ग्रसित एक चिकित्सक की तरह है; और यह एक गंभीर विफलता है।
  12. आध्यात्मिक अनुभवों से अभी तक अनभिज्ञ होने के कारण, उन्हें लागू न करने वाला व्यक्ति उस धनी व्यक्ति की तरह होता है, जिसने अपने खजाने की चाबी खो दी है; और यह एक गंभीर विफलता है।
  13. जिसने स्वयं अपने आपको नहीं जाना, यदि वह दूसरों के सिद्धांतों को समझाने का प्रयास करता है तो उस अंधे व्यक्ति की तरह होता है जो अंधे को समझाता है; और यह एक गंभीर विफलता है।
  14. एक तकनीक से उत्पन्न हुए एक अनुभव को ही सर्वोच्च मानना एक ऐसे व्यक्ति की तरह है जो सोने के लिए तांबे की गलती करता है; और यह एक गंभीर विफलता है।

ऐसा क्यों है? क्योंकि सम्यक् दृष्टि समाधि के उत्कृष्ट प्रकाश के आधार पर विवेक की भावना से, साधक चीजों और घटनाओं की वास्तविक प्रकृति को देखने में सक्षम होता है, इस प्रकार प्रत्येक परिस्थिति में धर्म के उपयुक्त अनुप्रयोग को समझ लेता है। यह महज संयोग नहीं है कि मैंने एक साधक के छह श्रेष्ठ लाभों को सूचीबद्ध किया है जो भाग 6 में पूरी तरह से सम्यक् दृष्टि के साथ सुसज्जित हैं। फिर भी, थान त्रि के द्वितीय मानसिक धर्म: सम्यक् दृष्टि- प्रभा समाधि की पूर्णता के लिए शुरू से ही क्रमिक चरणों की आवश्यकता है, सम्यक् दृष्टि की आधारभूत परिभाषा से आरम्भ कर, सम्यक् दृष्टि के विभिन्न पक्षों, सम्यक् दृष्टि के लाभ और मिथ्या दृष्टि के दोष, उच्च स्तर पर व्यापक सम्यक् दृष्टि से कैसे युक्त हों और सम्यक् दृष्टि के प्रकृष्ट प्रकाश को कैसे प्राप्त करें…। इन क्रमिक चरणों के बिना, समाधि प्राप्त करने का कोई तरीका नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे हम दौड़ने से पहले चलना सीखते हैं। इसके विपरीत बौद्धेतर संप्रदायों की प्रथाओं में जादू-टोना या मन-पढ़ने की क्षमताओं को बढ़ाने की प्रवृत्ति दिखाई देती है, द्वितीय मानसिक धर्म के अभ्यास से “संवेदनशील प्राणियों को उपदेश देने और परिवर्तित करने” का जादू चलेगा, अर्थात मिथ्या दृष्टि के खिलाफ लड़ने के लिए सम्यक् दृष्टि  को नियोजित करें, प्रत्येक शब्द या वाक्य को सत्त्वों की आसक्ति को तोड़ने के लिए एक हथियार के रूप में प्रयोग करें ताकि उन्हें प्रबुद्धता के संशय से बाहर लाया जा सके। इस मामले के बारे में अधिक तर्क आपको भाग 8 में प्रस्तुत किए जाएंगे।

सभी सत्त्व बुद्ध के स्वभाव से सुख प्राप्त करें।

ओं मणि पद्मे हूं

लेखक – थिनले गुयेन थान (फु वान पर्वत की चोटी पर एक बरसात की दोपहर में, 16 जनवरी 2019)

अनुवादक- डॉ. विकास सिंह (भारत के बिहार के दरभंगा में स्थित ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में संस्कृत के सहायक आचार्य हैं।)


अंग्रेजी अनुवाद:  LÀM SAO ĐỂ QUANG MINH THÀNH TAM MUỘI?

वियतनामी मूल: HOW TO TURN THE BRILLIANT LIGHT (PRABHA) INTO SAMADHI? 


THANH TRI – THE 2ND MIND DHARMA: SAMYAGDRSTI – PRABHA SAMADHI

PART 1: INTRODUCTION

PART 2: WHAT IS RIGHT VIEW?

PART 3: RIGHT VIEW IN DIFFERENT ASPECTS”

PART 4: GAIN FROM RIGHT VIEW, LOSE OF WRONG VIEW

PART 5: HOW TO BE EQUIPPED WITH THE FULL RIGHT VIEW

PART 7:  HOW TO TURN THE BRILLIANT LIGHT (PRABHA) INTO SAMADHI? 

PART 8:  THINGS TO NOTICE AS YOU PRACTICE SAMYAGDRSTI – PRABHA SAMADH

PART 9:  HOW DOES THE 2NDMIND DHARMA WORK?

PART 10:  WORDS FROM A MAN WHO WISHES TO BE THE 3RD HARDLY MET PERSON


Đệ nhị Tâm pháp Thanh Trí CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI:

Bài 1: LỜI NÓI ĐẦU

Bài 2: THẾ NÀO GỌI LÀ CHÁNH KIẾN?

Bài 3: NHỮNG GÓC TƯ DUY VỀ CHÁNH KIẾN 

Bài 4: ÍCH LỢI TỪ CHÁNH KIẾN, TÁC HẠI TỪ TÀ KIẾN

Bài 5: LÀM SAO ĐỂ ĐƯỢC TRANG BỊ CHÁNH KIẾN TOÀN DIỆN?

Bài 6: LÀM SAO ĐỂ CHÁNH KIẾN ĐƯỢC QUANG MINH?

Bài 7: LÀM SAO ĐỂ QUANG MINH THÀNH TAM MUỘI?

Bài 8: NHỮNG LƯU Ý CẦN BIẾT KHI ĐẾN VỚI CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI

Bài 9: CƠ CẤU VẬN HÀNH CỦA TÂM PHÁP “CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI”

Bài 10: TÂM SỰ CỦA KẺ LUÔN MONG ĐƯỢC NOI GƯƠNG HẠNG NGƯỜI THỨ BA


 

  1. Tantra Dharmapabodhisita says:

    Dear H.H. Guru,

    Thanks (Puṇyānumodana), for teaching us the path how to turn the right view into “brilliant light” (prabhā). H.H. Guru, you have well said in your words about the wisdom light which is shining from Buddhist practitioners are more brilliant than that of the follower of other devas, pretas etc.

    Your division of Samādhi is beneficial for us for gaining Right View. You divided it into the part, whole part and completeness. You discussed the ten visual objects (kasiṅa) of meditation. I want to know more about these kasiṅas, and I am sure gradually, I will find my answer through your pious words. The first time, now I have known about the Eight dharmas of taking refuge in the Three Jewels according to our spiritual Thanh Tri Yoga. In the eight dharma, you quoted the line of great Buddhist Scholar Atisha is constructive for us to know the importance of our Guru. The line is, “The Guru is more benevolent than the Buddha. His words are more important than the sutra.”

    Dear Guru, I want to know more about the types of Bodhicitta?

    Om Mani Padme Hum

     

    Regards and Thanks

    Tantra Dharmapabodhisita 

     

    • Admin
      Nguyên Thành says:

      Dear Tantra Dharmapabodhisita,
      Thank you for your comment with nice words. I am happy with your correct understanding about the main content of the article. I appreciate your humility.
      There are two types of Bodhicitta. One is aspirational Bodhicitta in which the practitioners pray for the enlightenment of all sentient beings. The other is application Bodhicitta in which the practitioners depend on their ability to help all sentient beings to practice Buddha Dharma to get enlightenment.
      I would like to read more of your comments on the site as a way of practicing Bodhicitta.
      May all sentient beings attain the happiness of Buddha’a nature.

  2. Tantra Dharmapabodhisita says:

    Thank you Dear H.H. Guru for your explanation and advice. I will follow your instructions.

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