Mar 31, 2020

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सम्यक् दृष्टि क्या है? ( Đệ nhị tâm pháp Thanh Trí: CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI Bài 2: THẾ NÀO GỌI LÀ CHÁNH KIẾN?)

वियतनाम के गुरु थिनले गुयेन थान द्वारा ‘द्वितीय मानसिक धर्म श्रृंखला’ का “सम्यक् दृष्टि- प्रभा समाधि” विषयक द्वितीय लेख

सम्यक् दृष्टि क्या है? कच्चायन द्वारा उठाए गए इस प्रश्न को बुद्ध ने पूरी तार्किकता से समझाया, तदनुसार सम्यक् दृष्टि (सम्मादिट्ठि) एक ऐसी अवस्था है – जो उस आसक्ति या उपादान को हटाती है जिसकी उत्पत्ति उस मिथ्या धारणा से होती है जो यह मानती है कि सब कुछ या तो अस्तित्व वाला है या अनस्तित्व वाला। विशेष रूप से उन्होंने कहा, “… जब कोई लोक के समुदय अर्थात् उत्पत्ति को सम्यक् प्रज्ञा से देखता है, तो उसके लिये ‘लोक नहीं है’ का ज्ञान नहीं होता। यदि जब कोई लोक के निरोध को सम्यक् प्रज्ञा से देखता है तो उसके लिये ‘लोक है’ का ज्ञान नहीं होता।

कच्चायन (कात्यायन) सोचता है कि ‘सब कुछ है (सब्बं अत्थि)’ यह एक अतिवाद है और ‘सब कुछ नहीं है (सब्बं नत्थि)’ यह एक दूसरा अतिवाद है । तथागत इन दोनों (शाश्वतवादी और उच्छेदवादी) अतिवादों को छोड़कर मध्यममार्ग की शिक्षा देते हैं, जिसका आशय है, “इसके होने पर यह होता है, इसके उत्पाद से इसका उत्पाद होता है (इमस्मिं सति इदं होति, इमस्सुप्पादा इदं उप्पज्जति)।” अविद्या की वजह से ही संखार (मानसिक वासना) का निर्माण होता है। संखार के होने से विञ्ञान (विज्ञान) होता है। विञ्ञान के कारण नाम-रूप होता है। नाम-रूप के कारण षडायतन होता है। षडायतन के कारण स्पर्श  होता है। स्पर्श से वेदना होती है। वेदना से तृष्णा होती है। तृष्णा से उपादान होता है। उपादान से भव उत्पन्न होता है। भव से जाति होती है। जाति से जरामरण आता है। और इस तरह इस संसार का उत्पाद दुःखों से होता है….” (संयुत्त निकाय)।

सम्यक् दृष्टि पर बुद्ध का स्पष्टीकरण कई वाक्यों में है लेकिन तीन महान असंख्य कल्पों और छह निरंतर वर्षों से बोधि वृक्ष के नीचे ध्यान के कारण ये उपदेश वर्तमान समय में सार रूप में कहे गए हैं, इनकी देशना कपिलवस्तु (प्राचीन भारत) के राजा शुद्धोधन के पुत्र राजकुमार सिद्धार्थ गौतम ने की थी। बुद्ध के समय में, 96 मिथ्या दृष्टि संप्रदायों के स्वामी एक अमर दिव्य लोकवाले और और पूजनीय तथाकथित “ब्रह्मन्” (परम-आत्मन्) में विश्वास करते थे। उन्होंने दावा किया कि पुरुषों और महिलाओं को ईश्वर द्वारा बनाया गया है और इस असीम दुनिया की संरचना और नियंत्रण ईश्वर के हाथों से की गई है या यह ब्रह्म (ब्रह्मन्) का एक स्वप्न है, इस प्रकार उन्होंने उन देवों की पूजा आरम्भ की और “परमात्मा” को खुश करने के लिए सभी तरह के प्रयास किए। इसके विपरीत, कुछ (मिथ्यादृष्टि) उपदेशक (स्वामी) यह मानते थे कि सब कुछ अस्तित्व में है अगर वे अपनी आँखों से देख सकते हैं और इसके विपरीत जो नहीं देखा जा सकता वह सब अस्तित्वहीन है। इसलिए वे अच्छाई के मूल्य को स्वीकार नहीं करते थे और परिणाम जाने बिना स्वयं के विषय में आजीविका सहित कार्य करते थे। अन्य अपनी दिव्य आँखों या दिव्य मन का उपयोग करके अपने पूर्वजों को गाय, कुत्ते या मछली जैसे जानवर के रूप में देखते थे …. जिससे उन्होंने मांस-भक्षण करने से मना कर दिया। संक्षेप में, ऐसी विचारधारा अथवा आनुभाविक तर्क दो अतिवादों में पड़ गए; आत्म से चिपके हुए और धर्म से चिपके हुए। ये जन्म, बुढ़ापे, बीमारी और मृत्यु के अंतहीन चक्र को जन्म देते हैं। बुद्ध इन संप्रदायों के जीवन और सृष्टिविज्ञान के दृष्टिकोण को पूरी तरह से अस्वीकार नहीं करते हैं, अपितु वे अविद्या को कम करने या उससे छुटकारा पाने में उनकी मदद करना चाहते हैं और कार्य-कारण प्रकृति को समझाते हैं, फिर उन्हें दुख से बचने का मार्ग बताते हैं। निर्वाण प्राप्ति के पश्चात् बोधि वृक्ष के नीचे बुद्ध ने स्पष्ट रूप से समझा था कि प्राणियों के दुःख क्या हैं, उनके दुःखों के कारण क्या हैं, फिर उन्होंने उन्हें दुखों को दूर करने की पद्धति सिखाई और अंत में उन्हें दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदा दिखाई। बुद्ध की आध्यात्मिक साधना को 37 बोधिपक्षीय धर्मों में वर्गीकृत किया गया है, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण “अष्टांगिक मार्ग” है- सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाक, सम्यक् कर्म,  सम्यक् आजीविका,  सम्यक् प्रयत्न,  सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि। सम्यक् दृष्टि इन सबमें सर्वप्रथम है, जो इसके महत्व को इंगित करता है, अन्य शेष 7 मार्ग इसके बिना वैसे ही अस्तित्वहीन हो जाएंगे या विकसित ही नहीं हो पाएंगे जैसे कि घर की नींव के क्षतिग्रस्त होने पर घर की दीवार, छत और स्तम्भ ढह जाते हैं। इस कारण से, बौद्ध साधकों को अपनी साधना के आरम्भ में सम्यक् दृष्टि को दृढ़ता से ग्रहण करना चाहिए क्योंकि यह उस मार्ग को प्रकाशित करेगा जो प्राणियों और गैर-प्राणियों के कारण जोखिम और बाधाओं से भरा हुआ है।

मिथ्या दृष्टि (मिच्चादिट्ठि), सम्यक् दृष्टि (सम्मादिट्ठि) के विपरीत है। मिथ्या दृष्टि का अर्थ है गलत मार्ग जो बुद्ध द्वारा दिखाए गए सही मार्ग के विपरीत है। “मिथ्या” (मिच्चा) शब्द का वास्तव में नकारात्मक अर्थ नहीं है, लेकिन इसका अर्थ है “अंतिम नहीं होना”, “मुक्त नहीं होना”। शिअन्तिअनदाओ और शिंतोवाद के उपदेशक/ गुरु भी लोगों को अच्छे कर्म करने और बुरे कर्मों से बचने की सलाह देते हैं लेकिन अंत में वे जन्म और मृत्यु के चक्र में ही बने रहते हैं। ब्रह्म (ब्रह्मन्), देव, अतुल की सर्वोच्च विशेषताओं की प्रशंसा करने के स्थान पर बुद्ध मानव शरीर प्राप्त करने के अनमोल अवसर की प्रशंसा करते हैं, क्योंकि केवल मानव में ही अज्ञानता को काटने के लिए और तीनों लोकों (त्रिलोक जिसमें कामुक इच्छाओं का संसार [कामधातु], रूप का संसार [रूपधातु] और निराकार की दुनिया [अरूपधातु] सम्मिलित हैं) से मुक्त होने के लिए धर्म का अभ्यास करने की प्रज्ञा है। यह उनके 49 साल के धर्म प्रचार के दौरान उनके अनेक उपदेशों में बतलाया गया है।

मुझे एक ज़ेन कथा याद है, जिसमें एक युवा भिक्षु के बारे में बताया गया है जो पृथ्वी पर चिंतन करते हुए जंगल के किनारे पर बैठा हुआ था। उसके उत्साह से शक्र (सक्र=इन्द्र=देवों के देव) प्रभावित हुआ, वह शक्र अभिवादन करने के लिए प्रकट हुआ और उस भिक्षु से पूछता है, “तुम युवा हो लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति रखते हो। मुझे बताओ तुम्हें क्या चाहिए। मैं आपकी मदद करूंगा क्योंकि मेरे पास जादुई शक्ति है! मुझे आपको प्रकोष्ठ, विहार, बेहतरीन और सुस्वादु भोजन और पेय की पेशकश करने में खुशी हो रही है।” युवा भिक्षु ने अपना सिर हिलाया, “मुझे एक चीज की आवश्यकता है जिसे आपकी जादुई शक्ति नहीं दे सकती!” देवों के स्वामी को आश्चर्य हुआ और उसने उस चीज को बताने के लिए कहा कि वह क्या है। भिक्षु मुस्कुराया और फिर धीरे से उत्तर दिया, “मुझे जो चाहिए वह है प्रज्ञा। क्या तुम यह कर सकते हो?” यह सुनकर, 33 देवताओं का शासन करने वाले स्वामी, इसके बारे में अधिक पूछे बिना ही शीघ्रता से अपने लोक में वापस भाग गए। यह ज्ञात होना चाहिए कि प्रज्ञा को “सम्यक् दृष्टि” की ईंटों से निर्मित घर से जोड़ा जाता है। इसलिए, सम्यक् दृष्टि बौद्ध धर्म में प्रज्ञा की नींव है। अगर कोई सम्यक् दृष्टि के बिना या (मिथ्यादृष्टि मिश्रित) अशुद्ध सम्यक् दृष्टि के साथ ज्ञान प्राप्त करना चाहता है तो वह पागल है। कुछ लोगों को छोड़कर, बहुत से लोग ऐसे हैं जो ऐसे बौद्ध धर्म का अभ्यास कर रहे हैं, जिसमें देवों या नागाओं को प्रणाम करते हैं या दान देते हैं जो कि तियानदाओ या हिंदू धर्म की परंपराएं हैं। दूसरी ओर, कुछ भिक्षु भी इस भौतिक दुनिया को नकारने पर नास्तिक या नकारात्मकवादी की तरह काम करते हैं। कुछ बौद्ध भौतिक शक्ति पाने के लिए इस बीच भाग्य के देवता और पृथ्वी के देवता की पूजा करते हैं, जबकि अन्य उनके द्वारा परेशान किए जाने के डर से प्रत्येक महीने के मध्य में (अमावस्या और पूर्णमासी के दिन) राक्षसों को धूप, फल और कैंडी चढ़ाते हैं या मन्नतों से निबद्ध कागज़ जलाते हैं। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि बौद्ध भिक्षु बुरी किस्मत से बचाने के लिए भूत भगाने में सक्षम हैं? सम्यक् दृष्टि वाले बौद्ध कभी भी ऐसा नहीं मानते और सम्यक् दृष्टि के अनुसार ही कार्य करते हैं। इसलिए, क्या मानना ​​है, कैसे और क्या करना है थान त्रि (शुद्ध मन) साधकों की सम्यक् दृष्टि को सुधारने के लिए 3 भागों में प्रस्तुत किया जाएगा: ” सम्यक् दृष्टि के विभिन्न पक्ष”।

लेखक – थिनले गुयेन थान (फु वान पर्वत की चोटी पर एक बरसात की दोपहर में, 10 जनवरी 2018)

अनुवादक – डॉ. विकास सिंह (भारत के बिहार के दरभंगा में स्थित ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में संस्कृत के सहायक आचार्य हैं।)


अंग्रेजी अनुवाद: PART 2: WHAT IS RIGHT VIEW?

वियतनामी मूल: Bài 2: THẾ NÀO GỌI LÀ CHÁNH KIẾN?


संबंधित लेख:

प्रथम भाग:  परिचय (Đệ nhị Tâm pháp Thanh Trí: CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI Bài 1:  LỜI NÓI ĐẦU)

सम्यक् दृष्टि क्या है? ( Đệ nhị tâm pháp Thanh Trí: CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI Bài 2: THẾ NÀO GỌI LÀ CHÁNH KIẾN?)

तृतीय भाग: विभिन्न पक्षों में सम्यक् दृष्टि (Đệ nhị Tâm pháp Thanh Trí: CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI Bài 3: NHỮNG GÓC TƯ DUY VỀ CHÁNH KIẾN)

चतुर्थ भाग: सम्यक् दृष्टि से लाभ और मिथ्या दृष्टि से हानि (Đệ nhị Tâm pháp Thanh Trí: CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI Bài 4: LỢI ÍCH TỪ CHÁNH KIẾN, TÁC HẠI TỪ TÀ KIẾN)


THANH TRI – THE 2ND MIND DHARMA: SAMYAGDRSTI – PRABHA SAMADHI

PART 1: INTRODUCTION

PART 2: WHAT IS RIGHT VIEW?

PART 3: RIGHT VIEW IN DIFFERENT ASPECTS”

PART 4: GAIN FROM RIGHT VIEW, LOSE OF WRONG VIEW

PART 5: HOW TO BE EQUIPPED WITH THE FULL RIGHT VIEW

PART 7:  HOW TO TURN THE BRILLIANT LIGHT (PRABHA) INTO SAMADHI? 

PART 8:  THINGS TO NOTICE AS YOU PRACTICE SAMYAGDRSTI – PRABHA SAMADH

PART 9:  HOW DOES THE 2NDMIND DHARMA WORK?

PART 10:  WORDS FROM A MAN WHO WISHES TO BE THE 3RD HARDLY MET PERSON


 

Đệ nhị Tâm pháp Thanh Trí CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI:

Bài 1: LỜI NÓI ĐẦU

Bài 2: THẾ NÀO GỌI LÀ CHÁNH KIẾN?

Bài 3: NHỮNG GÓC TƯ DUY VỀ CHÁNH KIẾN 

Bài 4: ÍCH LỢI TỪ CHÁNH KIẾN, TÁC HẠI TỪ TÀ KIẾN

Bài 5: LÀM SAO ĐỂ ĐƯỢC TRANG BỊ CHÁNH KIẾN TOÀN DIỆN?

Bài 6: LÀM SAO ĐỂ CHÁNH KIẾN ĐƯỢC QUANG MINH?

Bài 7: LÀM SAO ĐỂ QUANG MINH THÀNH TAM MUỘI?

Bài 8: NHỮNG LƯU Ý CẦN BIẾT KHI ĐẾN VỚI CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI

Bài 9: CƠ CẤU VẬN HÀNH CỦA TÂM PHÁP “CHÁNH KIẾN QUANG MINH TAM MUỘI”

Bài 10: TÂM SỰ CỦA KẺ LUÔN MONG ĐƯỢC NOI GƯƠNG HẠNG NGƯỜI THỨ BA

  1. Dr. Vikas Singh says:
    Thanks GURU, for explaining the RIGHT VIEW (the first and main among the nobel eight fold path). Very beautiful illustration of Right and Wrong views accordingly Brahmajal Sutta (Dighanikaya) as well as your experiences. I am very happy  to understand this perception with your experience in a deep manner.
    • Nguyên Thành
      Nguyên Thành says:

      I think that you understand every acspects of Bhudhism, I only wrote befor!

  2. Vishnu mishra says:
    सम्यकदृष्टि पर यह लेख अद्भूत है परन्तु मुझे लगता है कि इसको और स्पष्टीकरण के द्वारा बताया जा सकता है एवं उद्धरणों का प्रयोग हो तो और अच्छा रहता ।
  3. Kaushal Kishor says:
    Really… Very Nice Explained by Dr. Vikash Singh Asst. Proff & HOD Deptt. Of Sanskrit, Marwari College LMNU Darbhanga, (Bihar) India … Here I learned a lots of Info. About Gautam Buddha ❤🙏
  4. Vishnu mishra says:
    यह लेख बहुत ही सार्थक है और बहुत ही सहज ढंग से प्रतिपाद्य को वर्णित किया गया है।यदि उद्धरणों के साथ यह लेख होता तो और सार्थक होता।
  5. Dr. Vikas Singh says:
    Dear Kaushal, this article is written and uttered by H.H. Guru Thinley Nguyen Thanh and I have translated this article into Hindi only. So make corrections.
    • Nguyên Thành
      Nguyên Thành says:

      Dear Vikash Singh! I am not afraid of 8 winds in Samsara but I afraid of You and another!

  6. Dr. Vikas Singh says:
    Dear H.H. GURU, this is your compassionate heart to vibrating for us, Thanks for showing the Saddhamma (the real path). What are the 8 winds, GURU please explain, I don’t know about this.
  7. Kaushal Kishor says:
    Very nice.. Written by Guru  Thineky Nguyen Thanh… & Translated in Hindi Language By Dr. Vikash Singh
  8. Kaushal Kishor says:
    Thanks 😊 For Guru Thineky Nguyen Thanh.. For Showing the Real path of Dharma… And Thanks for Dr. Vikash Singh translating this ..!
  9. Govind kr. Meena says:
    अविद्या ही समस्त अकुशल कर्मों के केन्द्र में होती है, इसके चलते पुदगल हीन एवं घृणित कार्यों में संलग्न होता है। इस मिथ्या दृष्टि जो अविद्या के कारण जन्मती है, उसी से पुदगल सही एवं गलत का भेद करने में असमर्थ होता है। ऐसे अकुशल कर्मों का प्रहाण करने में सम्यक दृष्टि ही महती भूमिका का निर्वहन करती है। लेखक ने ऐसे जटिल विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करके हम सभी को लाभान्वित किया है एवं अनुवादक महोदय का योगदान भी प्रशंसनीय है।
    • Nguyên Thành
      Nguyên Thành says:

      आपका बहुत-बहुत धन्यवाद (Than you very much)

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